श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 7: दक्ष द्वारा यज्ञ सम्पन्न करना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक
सन्धीयमाने शिरसि दक्षो रुद्राभिवीक्षित: ।
सद्य: सुप्त इवोत्तस्थौ दद‍ृशे चाग्रतो मृडम् ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
सन्धीयमाने—सम्पन्न होने पर; शिरसि—सिर से; दक्ष:—राजा दक्ष; रुद्र-अभिवीक्षित:—रुद्र द्वारा देखे जाने पर; सद्य:—तुरन्त; सुप्ते—सोया हुआ; इव—समान; उत्तस्थौ—जगाया जाकर; ददृशे—देखा; च—भी; अग्रत:—समक्ष; मृडम्—शिव को ।.
 
अनुवाद
 
 जब दक्ष के शरीर पर पशु का सिर लगा दिया गया तो दक्ष को तुरन्त ही होश आ गया और ज्योंही वह निद्रा से जगा, तो उसने अपने समक्ष शिवजी को खड़े देखा।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर यह उदाहरण दिया गया है कि दक्ष उठकर खड़ा हुआ, मानो उसे गहरी नींद से जगाया गया हो। इसे ही संस्कृत में सुप्त इवोत्तस्थौ कहते हैं। इसका अर्थ यह है कि निद्रा से जगने पर मनुष्य को तुरन्त स्मरण हो आता है कि उसे क्या करना है। दक्ष का वध किया गया था और उसका सिर काट कर जला दिया गया था। उसका शरीर मृत पड़ा था, किन्तु शिव की कृपा से, ज्योंही उसके शरीर में बकरे का सिर जोड़ दिया गया, दक्ष पुन: चेतन हो उठा। इससे यह सूचित होता है कि चेतना भी व्यष्टि होती है। वास्तव में जब दक्ष के बकरे का सिर लगा दिया गया तो दक्ष को दूसरा शरीर प्राप्त हुआ, किन्तु चेतना व्यक्तिगत होने से उसे पूर्ववत् चेतना प्राप्त हो गई, यद्यपि उसका शरीर बदल गया था। इस तरह शारीरिक संरचना का चेतना के विकास से कोई सरोकार नहीं रहता। चेतना तो आत्मा के देहान्तर के साथ ले जायी जाती है। वैदिक इतिहास में इसके कई उदाहरण मिलते हैं, यथा महाराज भरत जिन्हें अपना राजा का शरीर त्यागने के बाद मृग का शरीर प्राप्त हुआ, किन्तु उनकी चेतना पूर्ववत् बनी रही। उन्हें यह ज्ञात था कि वे पूर्वजन्म में राजा भरत थे, और उनका शरीर हिरण के शरीर में स्थानान्तरित हुआ था, क्योंकि मृत्यु के समय वे मृग के चिन्तन में लीन थे। मृग का शरीर होते हुए भी उनकी चेतना उतनी ही अच्छी थी जितनी कि राजा भरत के शरीर में। भगवान् की यह व्यवस्था इतनी उत्तम है कि यदि किसी की चेतना कृष्णचेतना में परिणत हो जाये तो इसमें सन्देह नहीं है कि अगले जीवन में भले ही उसे भिन्न प्रकार की देह प्राप्त हो, किन्तु वह महान् कृष्ण-भक्त होगा।
 
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