श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक
बालोऽसि बत नात्मानमन्यस्त्रीगर्भसम्भृतम् ।
नूनं वेद भवान् यस्य दुर्लभेऽर्थे मनोरथ: ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
बाल:—बालक; असि—हो; बत—फिर भी; न—नहीं; आत्मानम्—मेरे; अन्य—दूसरी; स्त्री—स्त्री; गर्भ—गर्भ; सम्भृतम्—से उत्पन्न; नूनम्—फिर भी; वेद—जानने का प्रयत्न करो; भवान्—अपने आप; यस्य—जिसका; दुर्लभे—अप्राप्य; अर्थे—वस्तु; मन:-रथ:—इच्छुक ।.
 
अनुवाद
 
 मेरे बालक, तुम्हें पता नहीं कि तुम मेरी कोख से नहीं, वरन् दूसरी स्त्री से उत्पन्न हुए हो। अत: तुम्हें ज्ञात होना चाहिए कि तुम्हारा प्रयास व्यर्थ है। तुम ऐसी इच्छा की पूर्ति चाह रहे हो जिसका पूरा होना असम्भव है।
 
तात्पर्य
 नन्हा सा बालक ध्रुव महाराज स्वभावत: अपने पिता के प्रति स्नेह से भरा था। उसे पता नहीं था कि उसकी दोनों माताओं में अन्तर है। यह अन्तर रानी सुरुचि ने बताया। उसने कहा कि चूँकि ध्रुव अबोध बालक है, अत: वह दोनों रानियों के अन्तर को नहीं समझ सकता। सुरुचि के गर्व का यह दूसरा वक्तव्य है।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥