श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 18

 
श्लोक
सत्यं सुरुच्याभिहितं भवान्मे
यद्दुर्भगाया उदरे गृहीत: ।
स्तन्येन वृद्धश्च विलज्जते यां
भार्येति वा वोढुमिडस्पतिर्माम् ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
सत्यम्—सत्य; सुरुच्या—सुरुचि द्वारा; अभिहितम्—कहा गया; भवान्—आपको; मे—मुझ; यत्—क्योंकि; दुर्भगाया:— अभागी के; उदरे—गर्भ में; गृहीत:—जन्म लेकर; स्तन्येन—स्तन के दूध से; वृद्ध: च—बड़ा हुआ; विलज्जते—लज्जा आती है; याम्—उसको; भार्या—पत्नी; इति—इस प्रकार; वा—अथवा; वोढुम्—स्वीकार करने के लिए; इड:-पति:—राजा; माम्— मुझको ।.
 
अनुवाद
 
 सुनीति ने कहा : प्रिय पुत्र, सुरुचि ने जो कुछ भी कहा है, वह ठीक है, क्योंकि तुम्हारे पिता मुझको अपनी पत्नी तो क्या अपनी दासी तक नहीं समझते, उन्हें मुझको स्वीकार करने में लज्जा आती है। अत: यह सत्य है कि तुमने एक अभागी स्त्री की कोख से जन्म लिया है और तुम उसके स्तनों का दूध पीकर बड़े हुए हो।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥