श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
यस्याङ्‌घ्रि पद्मं परिचर्य विश्व
विभावनायात्तगुणाभिपत्ते: ।
अजोऽध्यतिष्ठत्खलु पारमेष्ठ्यं
पदं जितात्मश्वसनाभिवन्द्यम् ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
यस्य—जिसके; अङ्घ्रि—पाँव; पद्मम्—कमल; परिचर्य—पूजा करके; विश्व—ब्रह्माण्ड; विभावनाय—सृष्टि के लिए; आत्त— प्राप्त; गुण-अभिपत्ते:—वांछित योग्यता प्राप्त करने के लिए; अज:—अजन्मा (ब्रह्मा); अध्यतिष्ठत्—प्राप्त हुआ; खलु— निश्चित रूप से; पारमेष्ठ्यम्—इस ब्रह्माण्ड में सर्वोच्च पद; पदम्—पद; जित-आत्म—जिसने मन को जीत लिया है; श्वसन— श्वास को साध कर; अभिवन्द्यम्—पूज्य ।.
 
अनुवाद
 
 सुनीति ने कहा : भगवान् इतने महान् हैं कि तुम्हारे परदादा ब्रह्मा ने मात्र उनके चरणकमलों की पूजा द्वारा इस ब्रह्माण्ड की सृष्टि करने की योग्यता अर्जित की। यद्यपि वे अजन्मा हैं और सब जीवात्माओं में प्रधान हैं, किन्तु वे इस उच्च पद पर भगवान् की ही कृपा से आसीन हैं, जिनकी आराधना बड़े-बड़े योगी तक अपने मन तथा प्राण-वायु को रोक कर करते हैं।
 
तात्पर्य
 सुनीति ने ब्रह्माजी का उदाहरण रखा, जो ध्रुव महाराज के परदादा थे। यद्यपि ब्रह्मा भी जीवात्मा हैं, किन्तु अपनी तपस्या के बल पर उन्होंने परमेश्वर की कृपा से इस ब्रह्माण्ड के स्रष्टा का उच्चपद प्राप्त किया। किसी भी प्रयास में सफल होने के लिए न केवल कठिन तपस्या करने की आवश्यकता होती है, वरन् भगवान् की कृपा पर भी आश्रित रहना पड़ता है। इसका संकेत ध्रुव महाराज को उनकी विमाता ने दिया था और अब उसकी पुष्टि उनकी अपनी माता सुनीति द्वारा की जा रही थी।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥