श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक
नारदस्तदुपाकर्ण्य ज्ञात्वा तस्य चिकीर्षितम् ।
स्पृष्ट्वा मूर्धन्यघघ्नेन पाणिना प्राह विस्मित: ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
नारद:—नारद मुनि ने; तत्—वह; उपाकर्ण्य—सुनकर; ज्ञात्वा—तथा जानकर; तस्य—उसका (ध्रुव महाराज का); चिकीर्षितम्—कार्यकलाप; स्पृष्ट्वा—स्पर्श करके; मूर्धनि—सिर पर; अघ-घ्नेन—समस्त पापों को भगाने वाले; पाणिना—हाथ से; प्राह—कहा; विस्मित:—चकित होकर ।.
 
अनुवाद
 
 नारद मुनि ने यह समाचार सुना और ध्रुव महाराज के समस्त कार्यकलापों को जानकर वे चकित रह गये। वे ध्रुव के पास आये और उनके सिर को अपने पुण्यवर्धक हाथ से स्पर्श करते हुए इस प्रकार बोले।
 
तात्पर्य
 जब ध्रुव महाराज अपनी माता सुनीति से राजमहल में घटी सभी घटनाएँ बता रहे थे वहाँ पर नारद उपस्थित नहीं थे। अत: यह प्रश्न किया जा सकता है कि नारद ने ये सारी बातें कैसे सुन लीं। इसका उत्तर है कि नारद त्रिकालज्ञ हैं। वे इतने शक्तिमान हैं कि वे सबों के हृदय में चल रही भूत, भविष्यत् तथा वर्तमान की घटनाओं को जान सकते हैं जिस प्रकार परमात्मा भगवान् को सब ज्ञात है। अत: ध्रुव महाराज के दृढ़ संकल्प को समझ कर नारद उनकी सहायता के लिए आये। इसकी व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है—भगवान् सबों के हृदय में विद्यमान हैं, अत: जब उन्हें पता चल जाता है कि कोई जीवात्मा भक्ति में प्रवेश करने के लिए इच्छुक है, तो वे अपना प्रतिनिधि भेजते हैं। इस प्रकार नारद को ध्रुव महाराज के पास भेजा गया। इसकी व्याख्या चैतन्यचरितामृत में मिलती है। गुरु-कृष्ण प्रसादे पाय भक्ति-लता-बीज—गुरु तथा कृष्ण की कृपा से भक्ति में प्रविष्ट हुआ जा सकता है। ध्रुव महाराज के संकल्प के कारण परमात्मा श्रीकृष्ण ने तुरन्त ही अपने प्रतिनिधि नारद को दीक्षार्थ भेज दिया।
 
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