श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक
नारद उवाच
नाधुनाप्यवमानं ते सम्मानं वापि पुत्रक ।
लक्षयाम: कुमारस्य सक्तस्य क्रीडनादिषु ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
नारद: उवाच—नारद मुनि ने कहा; न—नहीं; अधुना—अभी; अपि—यद्यपि; अवमानम्—अपमान; ते—तुमको; सम्मानम्— आदर; वा—अथवा; अपि—निश्चय ही; पुत्रक—हे पुत्र; लक्षयाम:—मुझे दिखाई पड़ रहा है; कुमारस्य—तुम जैसे बालकों का; सक्तस्य—आसक्त; क्रीडन-आदिषु—खेल इत्यादि में ।.
 
अनुवाद
 
 महर्षि नारद ने ध्रुव से कहा : हे बालक, अभी तो तुम नन्हें बालक हो, जिसकी आसक्ति खेल इत्यादि में रहती है। तो फिर तुम अपने सम्मान के विपरीत अपमानजनक शब्दों से इतने प्रभावित क्यों हो?
 
तात्पर्य
 सामान्य रूप से जब बच्चे को बदमाश या मूर्ख कह कर डाँटा जाता है, तो वह हँस देता है और इन अपमानजनक शब्दों को गम्भीरता से नहीं लेता। इसी प्रकार यदि उससे सम्मानसूचक शब्द कहे जाते हैं, तो भी वह उनकी परवाह नहीं करता। किन्तु ध्रुव महाराज में क्षत्रिय जोश इतना प्रबल था कि वे अपनी विमाता द्वारा किये गये रंचमात्र अपमान को भी सहन नहीं कर पाये क्योंकि इससे इनके क्षत्रिय-सम्मान को धक्का लगा था।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥