श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक
गुणाधिकान्मुदं लिप्सेदनुक्रोशं गुणाधमात् ।
मैत्रीं समानादन्विच्छेन्न तापैरभिभूयते ॥ ३४ ॥
 
शब्दार्थ
गुण-अधिकात्—अधिक योग्य पुरुष से; मुदम्—प्रसन्नता; लिप्सेत्—अनुभव करे; अनुक्रोशम्—दया; गुण-अधमात्—कम योग्य पुरुष से; मैत्रीम्—मित्रता; समानात्—समान (गुण वाले) से; अन्विच्छेत्—कामना करे; न—नहीं; तापै:—दुख से; अभिभूयते—प्रभावित होता है ।.
 
अनुवाद
 
 प्रत्येक मनुष्य को इस प्रकार व्यवहार करना चाहिए : यदि वह अपने से अधिक योग्य व्यक्ति से मिले, तो उसे अत्यधिक हर्षित होना चाहिए, यदि अपने से कम योग्य व्यक्ति से मिले तो उसके प्रति सदय होना चाहिए और यदि अपने समान योग्यता वालों से मिले तो उससे मित्रता करनी चाहिए। इस प्रकार मनुष्य को इस भौतिक संसार के त्रिविध ताप कभी भी प्रभावित नहीं कर पाते।
 
तात्पर्य
 सामान्यत: अपने से अधिक योग्य व्यक्ति को पाकर हम उससे ईष्या करने लगते हैं, अपने से कम योग्य व्यक्ति से मिलने पर हम उस का उपहास करते हैं और अपने समान व्यक्ति को पाकर हम अपने कार्यों के प्रति गर्वित हो उठते हैं। ये ही सभी भौतिक कष्टों के कारण हैं। इसीलिए नारद मुनि ने उपदेश दिया कि भक्त को संयत भाव से आचरण करना चाहिए। अपने से अधिक योग्य व्यक्ति से द्वेष करने की अपेक्षा उसका प्रसन्नतापूर्वक स्वागत करना चाहिए। कम योग्य व्यक्ति को पीड़ा पहुँचाने के बजाय उस पर दयामय होना चाहिए जिससे वह उचित स्तर तक उठ सके। और जब समान गुण वाले किसी व्यक्ति से भेंट हो तो उसके समक्ष अपने कार्यकलापों के प्रति गर्व प्रकट न करके उसके साथ मित्र जैसा व्यवहार करना चाहिए। मनुष्य को चाहिए कि जो श्रीकृष्ण को भूल जाने के कारण कष्ट भोग रहे हैं, उन सब पर दयाभाव रखे। इन प्रमुख कार्यों से मनुष्य इसी जगत में सुखी बन सकता है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥