श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक
पदं त्रिभुवनोत्कृष्टं जिगीषो: साधु वर्त्म मे ।
ब्रूह्यस्मत्पितृभिर्ब्रह्मन्नन्यैरप्यनधिष्ठितम् ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
पदम्—पद; त्रि-भुवन—तीनों लोक; उत्कृष्टम्—सर्वश्रेष्ठ; जिगीषो:—इच्छुक; साधु—ईमानदार; वर्त्म—राह; मे—मुझको; ब्रूहि—कहो; अस्मत्—हमारा; पितृभि:—पूर्वजों, पिता तथा पितामह द्वारा; ब्रह्मन्—हे महान् ब्राह्मण; अन्यै:—अन्यों द्वारा; अपि—भी; अनधिष्ठितम्—प्राप्त नहीं हो सका ।.
 
अनुवाद
 
 हे विद्वान् ब्राह्मण, मैं ऐसा पद ग्रहण करना चाहता हूँ जिसे अभी तक तीनों लोकों में किसी ने भी, यहाँ तक कि मेरे पिता तथा पितामहों ने भी, ग्रहण न किया हो। यदि आप अनुगृहीत कर सकें तो कृपा करके मुझे ऐसे सत्य मार्ग की सलाह दें, जिसे अपना करके मैं अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर सकूँ।
 
तात्पर्य
 जब ध्रुव महाराज ने नारद मुनि से ब्राह्मण उपदेश ग्रहण करना अस्वीकार कर दिया तो स्वभावत: अगला प्रश्न यही उठता है कि वे कैसा उपदेश चाह रहे थे। यहाँ तक कि नारद के पूछने के पहले ही ध्रुव ने अपनी हार्दिक इच्छा प्रकट कर दी। निस्सन्देह, उनका पिता चक्रवर्ती सम्राट था और पितामह ब्रह्मा ब्रह्माण्ड को स्रष्टा। ध्रुव महाराज ने अपने पिता तथा पितामह से भी बढक़र श्रेष्ठ साम्राज्य प्राप्त करने की आकांक्षा व्यक्त की। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि वे ऐसा राज्य चाहते हैं जिसका तीनों लोकों में कोई प्रतियोगी न हो। इस ब्रह्माण्ड के सबसे महान् पुरुष ब्रह्मा हैं और ध्रुव महाराज इनसे भी श्रेष्ठ पद प्राप्त करना चाह रहे थे। वे नारद की उपस्थिति का लाभ उठाना चाह रहे थे क्योंकि उन्हें पता था कि यदि श्रीकृष्ण के सबसे बड़े भक्त नारद मुनि उन्हें आशीर्वाद दें अथवा मार्गदर्शन करें तो निश्चय ही वे तीनों लोकों में किसी भी व्यक्ति से उच्चतर पद प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार वे उस पद को प्राप्त करने में नारद जी की सहायता चाह रहे थे। वे ब्रह्मा से भी बड़ा पद प्राप्त करना चाहते थे। यह व्यवहारत: असम्भव बात थी, किन्तु भगवान् को प्रसन्न करके भक्त द्वारा असम्भव को भी सम्भव बनाया जा सकता है।

यहाँ पर जो एक विशेष बात कही गई है, वह यह है कि ध्रुव महाराज उच्च पद ग्रहण करना चाह रहे थे, किन्तु छल-छद्म से नहीं, वरन् सच्चे साधनों से। इससे सूचित होता है कि यदि कृष्ण उन्हें ऐसा पद दें तो वे उसे स्वीकार कर लेंगे। ऐसा भक्त का स्वभाव होता है। वह भौतिक लाभ की इच्छा कर सकता है, किन्तु उसे तभी स्वीकार करता है जब कृष्ण प्रदान करते हैं। ध्रुव महाराज को दुख था कि वे नारद मुनि के उपदेश को नहीं मान पा रहे थे; इसीलिए उन्होंने नारद जी से प्रार्थना की कि वे कृपालु होकर उन्हें ऐसा मार्ग दिखाएँ जिससे उनकी आन्तरिक अभिलाषा पूर्ण हो सके।

 
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