श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक
नूनं भवान्भगवतो योऽङ्गज: परमेष्ठिन: ।
वितुदन्नटते वीणां हिताय जगतोऽर्कवत् ॥ ३८ ॥
 
शब्दार्थ
नूनम्—निश्चय ही; भवान्—आप; भगवत:—भगवान् के; य:—जो; अङ्ग-ज:—शरीर से उत्पन्न; परमेष्ठिन:—ब्रह्मा; वितुदन्— बजाते हुए; अटते—सर्वत्र विचरण करते हो; वीणाम्—वीणा; हिताय—कल्याण के लिए; जगत:—संसार के; अर्क-वत्— सूर्य के समान ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवन्, आप ब्रह्मा के सुयोग्य पुत्र हैं और आप अपनी वीणा बजाते हुए समस्त विश्व के कल्याण हेतु विचरण करते रहते हैं। आप सूर्य के समान हैं, जो समस्त जीवों के लाभ के लिए ब्रह्माण्ड-भर में चक्कर काटता रहता है।
 
तात्पर्य
 ध्रुव महाराज यद्यपि बालक थे, किन्तु उन्होंने आशा व्यक्त की कि उन्हें राज्य-प्राप्ति का वरदान प्राप्त हो, जो ऐश्वर्य में उनके बाप-दादों के ऐश्वर्य से बढक़र हो। उन्होंने आभार भी व्यक्त की कि नारद जैसे महापुरुष से उनकी भेंट हुई है जिनका कार्य सूर्य के समान घूम-घूम कर विश्व को आलोकित करना है। नारद मुनि सारे ब्रह्माण्ड की यात्रा एकमात्र इस उद्देश्य से करते रहते हैं कि प्रत्येक जीव को वे भगवान् का भक्त बनना सिखा कर उसका कल्याण कर सकें। इस प्रकार ध्रुव महाराज को पूरा विश्वास हो गया था कि नारद मुनि उनकी इच्छा की पूर्ति कर सकते हैं, भले ही उनकी यह इच्छा अपूर्व थी।

यहाँ पर सूर्य का उदाहरण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। सूर्य इतना दयालु है कि बिना किसी भेदभाव के वह सर्वत्र प्रकाश संवितरित करता रहता है। ध्रुव महाराज ने नारद मुनि से प्रार्थना की कि वे उन पर कृपालु हों। उन्होंने इशारा किया कि समस्त बद्धजीवों का कल्याण करने के लिए नारद जी सारे ब्रह्माण्ड में विचरते रहते हैं। उन्होंने प्रार्थना की कि नारद मुनि उनकी विशेष इच्छा पूरी करने का वरदान देकर अनुग्रह करें। ध्रुव महाराज अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए कृत-संकल्प थे और इसी के लिए ही तो उन्होंने अपना घर तथा महल त्यागा था।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥