श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक
तत्तात गच्छ भद्रं ते यमुनायास्तटं शुचि ।
पुण्यं मधुवनं यत्र सान्निध्यं नित्यदा हरे: ॥ ४२ ॥
 
शब्दार्थ
तत्—उस; तात—हे पुत्र; गच्छ—जाओ; भद्रम्—शुभ हो; ते—तुम्हारा; यमुनाया:—यमुना का; तटम्—किनारा, तट; शुचि— शुद्ध; पुण्यम्—पवित्र; मधु-वनम्—मधुवन नामक; यत्र—जहाँ; सान्निध्यम्—निकट होते हुए; नित्यदा—सदैव; हरे:—भगवान् के ।.
 
अनुवाद
 
 हे बालक, तुम्हारा कल्याण हो। तुम यमुना के तट पर जाओ, जहाँ पर मधुवन नामक विख्यात जंगल है और वहीं पर पवित्र होओ। वहाँ जाने से ही मनुष्य वृन्दावनवासी भगवान् के निकट पहुँचता है।
 
तात्पर्य
 नारद मुनि तथा ध्रुव महाराज की माता सुनीति दोनों ने ही ध्रुव महाराज को भगवान् की उपासना करने के लिए सलाह दी। अब नारद मुनि विशेष रूप से निर्देश दे रहे हैं कि भगवान् की यह आराधना किस प्रकार जल्द ही फलवती हो। वे ध्रुव महाराज को यमुना के तट पर, जहाँ मधुवन नामक वन है, जाकर ध्यान करने और जप करने की सलाह देते हैं।

आध्यात्मिक जीवन में शीघ्र प्रगति के लिए भक्त को तीर्थस्थान से विशेष लाभ प्राप्त होता है। यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण सर्वत्र वास करते हैं, किन्तु इन पवित्र स्थानों में जाने से उनके निकट तक पहुँचने में सरलता होती है, क्योंकि ऐसे स्थानों में बड़े-बड़े ऋषि-मुनि रहते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि जहाँ कहीं भी उनके भक्त उनकी दिव्य लीलाओं का कीर्तन करते हैं, वहीं वे वास करते हैं। भारत में अनेक तीर्थस्थान हैं। इनमें से बदरीनारायण, द्वारका, रामेश्वरम तथा जगन्नाथपुरी प्रमुख हैं। ये पवित्र स्थान चारों धाम कहलाते हैं। धाम का अर्थ है ऐसा स्थान जहाँ भगवान् से तुरन्त सम्पर्क स्थापित हो सके। बदरीनारायण जाने के लिए हरद्वार होकर जाना होता है। इसी प्रकार अन्य तीर्थस्थल हैं, यथा प्रयाग (इलाहाबाद) तथा मथुरा, और इन सबों में सर्वोपरि है वृन्दावन। जब तक कोई आध्यात्मिक जीवन में बहुत ऊपर उठा नहीं होता, उसे ऐसे स्थानों में रहकर भक्ति करने की संस्तुति की जाती है। किन्तु नारद मुनि जैसा सिद्ध भक्त, जो सदैव प्रचार कार्य में लगा रहता है, कहीं भी भगवान् की सेवा कर सकता है। कभी-कभी नारद नरक लोक में भी जाते हैं। उन्हें नारकीय अवस्थाएँ प्रभावित नहीं करती, क्योंकि वे भक्ति के अत्यन्त उत्तरदायित्वपूर्ण कार्य में व्यस्त रहते हैं। नारद मुनि के अनुसार वृन्दावन, जो मथुरा जिले के वृन्दावन क्षेत्र में स्थित है, सबसे अधिक पवित्र स्थान है। आज भी अनेक साधु पुरुष वहाँ रहकर भगवान् की भक्ति करते हैं।

वृन्दावन क्षेत्र में बारह वन हैं और मधुवन इनमें से एक है। भारत भर के तीर्थयात्री एकत्र होकर इन बारहों वनों का दर्शन करते हैं। इनमें से पाँच वन यमुना के पूर्वी तट पर हैं। ये हैं—भद्रवन, विल्ववन, लौहवन, भाण्डीरवन तथा महावन। यमुना के पश्चिमी तट पर सात वन हैं, जो इस प्रकार हैं—मधुवन, तालवन, कुमुदवन, बहुलावन, काम्यवन, खदिरवन तथा वृन्दावन। इन बारहों वनों में विभिन्न घाट हैं जिनके नाम इस प्रकार हैं—(१) अविमुक्त, (२) अधिरूढ़, (३) गुह्य-तीर्थ, (४) प्रयाग-तीर्थ, (५) कनखल, (६) तिन्दुक-तीर्थ, (७) सूर्य-तीर्थ, (८) वटस्वामी, (९) ध्रुव घाट (जहाँ अनेक फल तथा पुष्प वृक्ष हैं। यह स्थान प्रसिद्ध है क्योंकि यहीं पर ध्रुव महाराज ने ऊँचे चबूतरे पर तपस्या की थी), (१०) ऋषि-तीर्थ, (११) मोक्ष-तीर्थ, (१२) बुद्ध-तीर्थ, (१३) गोकर्ण, (१४) कृष्ण-गंगा, (१५) वैकुण्ठ, (१६) असि-कुंड, (१७) चतु:सामुद्रिक कूप, (१८) अक्रूर-तीर्थ (जब अक्रूर के रथ से कृष्ण तथा बलराम मथुरा जा रहे थे तो इसी घाट में सबों ने स्नान किया था), (१९) याज्ञिक-विप्र-स्थान, (२०) कुब्जा-कूप, (२१) रंग-स्थल, (२२) मंच-स्थल, (२३) मल्लयुद्ध-स्थान तथा (२४) दशाश्वमेध।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥