श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक
प्रसादाभिमुखं शश्वत्प्रसन्नवदनेक्षणम् ।
सुनासं सुभ्रुवं चारुकपोलं सुरसुन्दरम् ॥ ४५ ॥
 
शब्दार्थ
प्रसाद-अभिमुखम्—सदैव अहैतुकी कृपा करने के लिए तत्पर; शश्वत्—सदैव; प्रसन्न—हर्षित; वदन—मुख; ईक्षणम्—दृष्टि; सु-नासम्—सुन्दर नाक; सु-भ्रुवम्—सुसज्जित भौंहें; चारु—सुन्दर; कपोलम्—कपोल; सुर—देवता; सुन्दरम्—देखने में सुन्दर ।.
 
अनुवाद
 
 [यहाँ पर भगवान् के रूप का वर्णन हुआ है।] भगवान् का मुख सदैव अत्यन्त सुन्दर और प्रसन्न मुद्रा में रहता है। देखने वाले भक्तों को वे कभी अप्रसन्न नहीं दिखते और वे सदैव उन्हें वरदान देने के लिए उद्यत रहते हैं। उनके नेत्र, सुसज्जित भौंहें, उन्नत नासिका तथा चौड़ा मस्तक—ये सभी अत्यन्त सुन्दर हैं। वे समस्त देवताओं से अधिक सुन्दर हैं।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में भगवान् के रूप के ध्यान करने की स्पष्ट विधि का वर्णन है। निर्गुण ध्यान आधुनिक युग की नकली खोज है। किसी भी वैदिक ग्रंथ में निर्गुण ध्यान की संस्तुति नहीं की गई। भगवद्गीता में, जहाँ ध्यान की संस्तुति की गई है, मत्पर: शब्द व्यवहृत हुआ है, जिसका अर्थ है, “मुझसे सम्बन्धित।” विष्णु का कोई भी रूप भगवान् श्रीकृष्ण से सम्बन्धित है क्योंकि श्रीकृष्ण ही आदि विष्णु रूप हैं। कभी-कभी कुछ लोग निर्गुण ब्रह्म का ध्यान करने का प्रयास करते हैं जिसका उल्लेख भगवद्गीता में अव्यक्त अर्थात् अप्रकट या निर्गुण कहकर किया गया है। किन्तु भगवान् ने स्वयं यह बतलाया है कि जो भगवान् के निर्गुण रूप के प्रति आसक्त हैं उन्हें अत्यन्त कठिनाई का सामना करना पड़ता है, क्योंकि कोई भी निर्गुण रूप पर ध्यान केन्द्रित नहीं कर सकता। मनुष्य को चाहिए कि भगवान् के उस रूप पर ध्यान केन्द्रित करे जिसका वर्णन यहाँ ध्रुव महाराज के ध्यान के प्रसंग में हुआ है। जैसाकि आगे चलकर स्पष्ट हो जाएगा, ध्रुव महाराज ने इस प्रकार के ध्यान में प्रवीणता प्राप्त की और उनका योग सफल हुआ।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥