श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक
श्रीवत्साङ्कं घनश्यामं पुरुषं वनमालिनम् ।
शङ्खचक्रगदापद्मैरभिव्यक्तचतुर्भुजम् ॥ ४७ ॥
 
शब्दार्थ
श्रीवत्स-अङ्कम्—भगवान् के वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिह्न; घन-श्यामम्—गहरा नीला; पुरुषम्—परम पुरुष; वन- मालिनम्—फूलों की माला से युक्त; शङ्ख—शंख; चक्र—चक्र; गदा—गदा; पद्मै:—कमल पुष्प से; अभिव्यक्त—प्रकट; चतु:-भुजम्—चार हाथों वाले को ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् को श्रीवत्स चिह्न अथवा ऐश्वर्य की देवी का आसन धारण किये हुए बताया गया है। उनके शरीर का रंग गहरा नीला (श्याम) है। भगवान् पुरुष हैं, वे फूलों की माला पहनते हैं और वे चतुर्भुज रूप में (नीचेवाले बाएँ हाथ से आरम्भ करते हुए) शंख, चक्र, गदा तथा कमल पुष्प धारण किये हुए नित्य प्रकट होते हैं।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में पुरुषम् शब्द अत्यन्त सार्थक है। ईश्वर कभी स्त्री रूप में नहीं रहते। वे हमेशा पुरुष रूप हैं। अत: जो निर्गुणवादी भगवान् की कल्पना स्त्री रूप में करते हैं, वे भ्रम में हैं। आवश्यकता पडऩे पर भगवान् स्त्री रूप में प्रकट होते हैं, किन्तु उनका शाश्वत मूल रूप पुरुष का है। भगवान् का स्त्री-रूप लक्ष्मी, राधारानी, सीता इत्यादि रूप में है। ये सभी देवियाँ भगवान् की दासियाँ हैं, वे कभी प्रधान नहीं, जैसाकि निर्गुणवादी भ्रान्तिवश कल्पना करते हैं। श्रीकृष्ण अपने नारायण रूप में सदैव चतुर्भुज रहते हैं। कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में जब अर्जुन ने उनका विराट रूप देखना चाहा तो उन्होंने अपने चतुर्भुज नारायण रूप का दर्शन कराया। कुछ भक्त इस मत के हैं कि श्रीकृष्ण नारायण के अवतार हैं, किन्तु भागवत मतावलम्बियों का कथन है कि नारायण श्रीकृष्ण का ही प्राकट्य है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥