श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 5

 
श्लोक
सङ्ग्रहेण मयाख्यात: प्रतिसर्गस्तवानघ ।
त्रि: श्रुत्वैतत्पुमान् पुण्यं विधुनोत्यात्मनो मलम् ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
सङ्ग्रहेण—संक्षेप में; मया—मेरे द्वारा; आख्यात:—कहा गया है; प्रतिसर्ग:—प्रलय का कारण; तव—तुम्हारा; अनघ—हे शुद्ध; त्रि:—तीन बार; श्रुत्वा—सुनकर; एतत्—वर्णन; पुमान्—वह जो; पुण्यम्—पुण्य; विधुनोति—धो देता है; आत्मन:— आत्मा का; मलम्—मल, कल्मष ।.
 
अनुवाद
 
 हे विदुर, मैंने संक्षेप में प्रलय के कारणों का वर्णन किया। जो इस वर्णन को तीन बार सुनता है उसे पुण्य लाभ होता है और उसके आत्मा का पापमय कल्मष धुल जाता है।
 
तात्पर्य
 सृष्टि की उत्पत्ति सत् के आधार पर होती है, किन्तु उसका विनाश अधर्म से होता है। यही भौतिक सृष्टि तथा विनाश की गति है। यहाँ बताया गया है कि विनाश का कारण अधर्म है। अधर्म तथा मृषा से क्रमश: दम्भ, माया, लोभ, निकृति (चालाकी), क्रोध, हिंसा, कलि, दुरुक्ति, मृत्यु, भीति, यातना तथा निरय उत्पन्न हुए। ये सारे वंशज विनाश के प्रतीक बतलाये गये हैं। यदि मनुष्य पवित्र है और इन विनाश के कारणों के सम्बन्ध में सुनता है तो इनके प्रति घृणा करेगा और इससे उसके पुण्य जीवन में प्रगति होगी। पुण्य हृदय को विमल करने की विधि का सूचक
है। जैसाकि भगवान् चैतन्य ने कहा है, जब मनुष्य अपने मन-दर्पण की धूल साफ कर लेता है, तब वह मुक्ति पथ पर आगे बढ़ सकता है। यहाँ भी वही विधि बताई गई है। मलम् का अर्थ है ‘कल्मष’। हमें चाहिए कि विनाश के समस्त कारणों से घृणा करना सीखें जिनमें अधर्म तथा मृषा प्रारम्भिक हैं, तभी हम पुण्य जीवन में अग्रसर हो सकेंगे। तब हमारे लिए कृष्णभावनामृत ग्रहण कर सकना सरल होगा और हम बारम्बार विनाश के भागी नहीं होंगे। अभी का जीवन, जन्म-मृत्यु का चक्र है, किन्तु यदि हम मुक्ति-पथ ढूँढें तो बार-बार के इस त्रास से बच सकते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥