श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक
पद्‌भ्यां नखमणिश्रेण्या विलसद्‌भ्यां समर्चताम् ।
हृत्पद्मकर्णिकाधिष्ण्यमाक्रम्यात्मन्यवस्थितम् ॥ ५० ॥
 
शब्दार्थ
पद्भ्याम्—अपने चरणकमलों से; नख-मणि-श्रेण्या—पाँव के अँगूठे के मणि सदृश्य नाखूनों की ज्योति से; विलसद्भ्याम्— चमकते चरणकमल; समर्चताम्—उनकी पूजा में तत्पर पुरुष; हृत्-पद्म-कर्णिका—हृदय के कमल पुष्प का पुंज; धिष्ण्यम्— स्थित; आक्रम्य—पकडक़र, कब्जा करके; आत्मनि—हृदय में; अवस्थितम्—स्थित ।.
 
अनुवाद
 
 वास्तविक योगी भगवान् के उस दिव्यरूप का ध्यान करते हैं जिसमें वे उनके हृदयरूपी कमल-पुंज में खड़े रहते हैं और उनके चरण-कमलों के मणितुल्य नाखून चमकते रहते हैं।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥