श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  4.8.55 
सलिलै: शुचिभिर्माल्यैर्वन्यैर्मूलफलादिभि: ।
शस्ताङ्कुरांशुकैश्चार्चेत्तुलस्या प्रियया प्रभुम् ॥ ५५ ॥
 
शब्दार्थ
सलिलै:—जल के प्रयोग से; शुचिभि:—पवित्र किया गया; माल्यै:—माला से; वन्यै:—जंगली फूलों से; मूल—जड़ों; फल- आदिभि:—नाना प्रकार की वनस्पतियों तथा फलों से; शस्त—दूर्वा (दूब); अङ्कुर—कलियाँ; अंशुकै:—वृक्षों की छाल, यथा भोज-पत्र से; च—तथा; अर्चेत्—पूजा करें; तुलस्या—तुलसी दलों से; प्रियया—जो भगवान् को अत्यन्त प्रिय; प्रभुम्— भगवान् को ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् की पूजा शुद्ध जल, शुद्ध पुष्प-माला, फल, फूल तथा जंगल में उपलब्ध वनस्पतियों या ताजे उगे हुए दूर्वादल एकत्र करके, फूलों की कलियों, अथवा वृक्षों की छाल से, या सम्भव हो तो भगवान् को अत्यन्त प्रिय तुलसीदल अर्पित करते हुए करनी चाहिए।
 
तात्पर्य
 यहाँ विशेष उल्लेख हुआ है कि भगवान् को तुलसीदल अत्यन्त प्रिय हैं। भक्तों को चाहिए कि वे प्रत्येक मन्दिर तथा पूजाकेन्द्र में तुलसी दल ले जाना न भूलें। पश्चिमी देशों में कृष्णभावनामृत-आन्दोलन के प्रसार में हमें सबसे अधिक अप्रसन्नता इसलिए होती थी हमें तुलसी के दल कहीं प्राप्त नहीं होते थे। अत: हम अपनी शिष्या श्रीमती गोविन्द दासी के अत्यन्त अनुगृहीत हैं, उन्होंने बीजों से तुलसी वृक्ष उगाने का प्रयत्न किया जिसमें उन्हें भगवद्कृपा से सफलता प्राप्त हुई। अब हम प्राय: प्रत्येक केन्द्र में तुलसी के पौधे उगा रहे हैं।

श्रीभगवान् की पूजा विधि में तुलसीदल का अत्यधिक महत्त्व है। इस श्लोक में आये हुए सलिलै: शब्द का अर्थ है “जल से।” निस्सन्देह, ध्रुव महाराज यमुना के तट पर पूजा कर रहे थे। यमुना तथा गंगा पवित्र नदियाँ हैं और कभी-कभी भारत के भक्त लोग यमुना या गंगा जल से मूर्ति के पूजे जाने का आग्रह करते हैं। किन्तु यहाँ हम समझते हैं कि देश काल का अर्थ है, “काल तथा देश के अनुसार।” पश्चिमी देशों में न तो यमुना नदी है, न गंगा नदी, अत: ऐसी नदियों का जल नहीं मिल पाता। तो क्या इसका अर्थ यह हुआ कि जल के अभाव में अर्चना बन्द कर दी जाय? नहीं। सलिलै: का अर्थ है कोई भी जल—जो भी प्राप्त हो—किन्तु इसे स्वच्छ होना चाहिए और स्वच्छ ढंग से रखा गया होना चाहिए। ऐसा जल काम में लाया जा सकता है। अन्य सामग्रियाँ—यथा फूलों की माला, फल तथा वनस्पतियों को देश तथा उनकी उपलब्धि के अनुसार एकत्र किया जाना चाहिए। भगवान् को प्रसन्न करने के लिए तुलसीदल अत्यन्त आवश्यक हैं, अत: जहाँ तक सम्भव हो तुलसीदल उगाने के लिए व्यवस्था की जानी चाहिए। ध्रुव महाराज को जंगल में उपलब्ध फलों तथा फूलों से भगवान् की पूजा करने की सलाह दी गई। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि वे वनस्पतियां, फल, फूल सभी कुछ स्वीकार करते हैं। यहाँ पर नारद मुनि ने जो कुछ कहा है उसके अतिरिक्त और कोई भी वस्तु भगवान् वासुदेव को नहीं अर्पित करनी चाहिए। स्वेच्छा से विग्रह पर कुछ नहीं चढ़ाना चाहिए। चूँकि फूल तथा फल विश्व में सर्वत्र उपलब्ध हैं, अत: इस छोटी सी बात के लिए सतर्क रहना चाहिए।

 
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