श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक
स्वेच्छावतारचरितैरचिन्त्यनिजमायया ।
करिष्यत्युत्तमश्लोकस्तद् ध्यायेद्‌धृदयङ्गमम् ॥ ५७ ॥
 
शब्दार्थ
स्व-इच्छा—उनकी (भगवान की) परम इच्छा से; अवतार—अवतार; चरितै:—कार्यकलाप; अचिन्त्य—अकल्पनीय; निज- मायया—अपनी ही शक्ति से; करिष्यति—करता है; उत्तम-श्लोक:—भगवान्; तत्—वह; ध्यायेत्—ध्यान करना चाहिए; हृदयम्-गमम्—अत्यन्त आकर्षक ।.
 
अनुवाद
 
 हे ध्रुव, प्रतिदिन तीन बार मंत्र जप करने और श्रीविग्रह की पूजा के अतिरिक्त तुम्हें भगवान् के विभिन्न अवतारों के दिव्य कार्यों के विषय में भी ध्यान करना चाहिए, जो उनकी परम इच्छा तथा व्यक्तिगत शक्ति से प्रदर्शित होते हैं।
 
तात्पर्य
 भक्ति की निर्दिष्ट विधियाँ नौ हैं—श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पूजन, सेवा, विग्रह को सर्वस्व समर्पण इत्यादि। यहाँ पर ध्रुव महाराज को सलाह दी गई है कि वे न केवल भगवान् के रूप का ध्यान करें, वरन् उनके विभिन्न अवतारों की दिव्य लीलाओं के विषय में भी चिन्तन करें। मायावादी दार्शनिक भगवान् के अवतारों को सामान्य जीवात्माओं के स्तर में मानते हैं। यह एक भारी भूल है। भगवान् के अवतार को प्रकृति के भौतिक नियमों के अनुसार कर्म करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है। यहाँ पर स्वेच्छा शब्द का प्रयोग यह सूचित करने के लिए किया गया है कि भगवान् अपनी परम इच्छा से प्रकट होते हैं। भगवान् द्वारा बद्धजीव को उसके कर्म के अनुसार प्रकृति के नियमों के अधीन दी गई विशेष देह को स्वीकार करने के लिए बाध्य किया जाता है। किन्तु जब भगवान् प्रकट होते हैं, तो उन पर भौतिक प्रकृति के नियम बलपूर्वक थोपे नहीं जा सकते। वे अपनी आन्तरिक शक्ति द्वारा इच्छानुसार प्रकट होते हैं। यही अन्तर है। बद्धजीव अपने कर्म तथा भौतिक प्रकृति की श्रेष्ठ सत्ता द्वारा दिया गया एक विशेष प्रकार का शरीर जैसे सुअर का शरीर स्वीकार करता है। किन्तु जब कृष्ण शूकर अवतार में प्रकट होते हैं, तो वे सामान्य पशु के रूप में सुअर नहीं होते। कृष्ण अत्यन्त विराट वराह अवतार के रूप में प्रकट होते हैं, जिसकी तुलना सामान्य सुअर से नहीं की जा सकती। उनका प्राकट्य तथा लोप हमारे लिए अकल्पनीय हैं। भगवद्गीता में स्पष्ट कहा गया है कि वे अपनी अन्तरंगा शक्ति से भक्तों की रक्षा तथा अभक्तों के विनाश के लिए प्रकट होते हैं। भक्त को समझना चाहिए कि कृष्ण कभी सामान्य पुरुष या सामान्य पशु के रूप में प्रकट नहीं होते। वराह मूर्ति या घोड़ा अथवा कछुवा रूप में उनका प्राकट्य उनकी अन्तरंगा शक्ति का प्रदर्शन है। ब्रह्म-संहिता में कहा गया है आनन्द-चिन्मय-रस प्रतिभाविताभि: मनुष्य को भगवान् के प्राकट्य को प्रकृति के नियमों से प्रेरित किसी पशु, मनुष्य अथवा देवता के रूप में जन्म, साधारण बद्धजीव की भाँति मानव प्राणी या पशु नहीं मान लेना चाहिए। ऐसा सोचना अपराधपूर्ण है। भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने मायावादियों की भर्त्सना भगवान् के प्रति अपराधपूर्ण होने के कारण की है, क्योंकि वे यह सोचते हैं कि भगवान् तथा बद्ध जीवात्माएँ एक ही जैसे हैं।

नारद ने ध्रुव को उपदेश दिया कि वे भगवान् की लीलाओं का ध्यान करें, क्योंकि यह भगवान् के रूप पर अपने मन को केन्द्रित करके ध्यान करने के ही तुल्य है। भगवान् के किसी भी रूप का ध्यान जितना उपयोगी है, उतना ही भगवान् के विभिन्न नामों यथा हरि, गोविन्द तथा नारायण नामों का जप करना है। किन्तु इस युग में हमें शास्त्रों में बताए गए; हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे, मंत्र का जप करने का विशेष उपदेश दिया गया है।

 
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