श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 59-60
 
 
श्लोक
एवं कायेन मनसा वचसा च मनोगतम् ।
परिचर्यमाणो भगवान् भक्तिमत्परिचर्यया ॥ ५९ ॥
पुंसाममायिनां सम्यग्भजतां भाववर्धन: ।
श्रेयो दिशत्यभिमतं यद्धर्मादिषु देहिनाम् ॥ ६० ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; कायेन—शरीर से; मनसा—मन से; वचसा—शब्दों से; च—भी; मन:-गतम्—भगवान् के चिन्तन मात्र से; परिचर्यमाण:—भक्ति में लगे हुए; भगवान्—भगवान्; भक्ति-मत्—भक्ति के नियमों के अनुसार; परिचर्यया—भगवान् की पूजा द्वारा; पुंसाम्—भक्त का; अमायिनाम्—जो एकनिष्ठ तथा गम्भीर है; सम्यक्—पूर्णरूप से; भजताम्—भक्ति में लगा हुआ; भाव-वर्धन:—जो भक्त के भाव को बढ़ाते हैं, भगवान्, श्रेय:; श्रेय:—अन्तिम उद्देश्य; दिशति—प्रदान करता है; अभिमतम्— आकांक्षा; यत्—यावत्रूप; धर्म-आदिषु—आध्यात्मिक जीवन तथा आर्थिक विकार के विषय में; देहिनाम्—बद्धजीवों का ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार जो कोई गम्भीरता तथा निष्ठा से अपने मन, वचन तथा शरीर से भगवान् की भक्ति करता है और जो बताई गई भक्ति-विधियों के कार्यों में मग्न रहता है, उसे उसकी इच्छानुसार भगवान् वर देते हैं। यदि भक्त भौतिक संसार में धर्म, अर्थ, काम या भौतिक संसार से मोक्ष चाहता है, तो भगवान् इन फलों को प्रदान करते हैं।
 
तात्पर्य
 भक्ति इतनी सभम होती है कि जो भक्ति करता है, वह भगवान् से मनचाहा वर प्राप्त कर सकता है। बद्धजीव इस भौतिक जगत में बहुत लिप्त रहते हैं और धार्मिक कृत्य करके वे धर्म तथा अर्थ का भौतिक लाभ उठाना चाहते हैं।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
About Us | Terms & Conditions
Privacy Policy | Refund Policy
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥