श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक
अथात: कीर्तये वंशं पुण्यकीर्ते: कुरूद्वह ।
स्वायम्भुवस्यापि मनोर्हरेरंशांशजन्मन: ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
अथ—अब; अत:—इसके बाद; कीर्तये—वर्णन करूँगा; वंशम्—वंश; पुण्य-कीर्ते:—पुण्य गुणों के लिए विख्यात; कुरु- उद्वह—हे कुरुश्रेष्ठ; स्वायम्भुवस्य—स्वायंभुव का; अपि—भी; मनो:—मनु का; हरे:—श्रीभगवान् का; अंश—विस्तार; अंश—का भाग; जन्मन:—जन्मा हुआ ।.
 
अनुवाद
 
 मैत्रेय ने आगे कहा : हे कुरुश्रेष्ठ, अब मैं आपके समक्ष स्वायंभुव मनु के वंशजों का वर्णन करता हूँ जो भगवान् के अंशांश के रूप में उत्पन्न हुए थे।
 
तात्पर्य
 ब्रह्मा भगवान् के शक्ति सम्पन्न अंश हैं। यद्यपि ब्रह्मा जीव-तत्त्व हैं, किन्तु उन्हें भगवान् से शक्ति प्राप्त है, अत: वे उनके अंश माने जाते हैं। कभी-कभी ऐसा होता है कि जब कोई ऐसा उपयुक्त जीव नहीं रहता जिसे ब्रह्मा नियुक्त किया जा सके, तो भगवान् स्वयं ब्रह्मा रूप में प्रकट होते हैं। ब्रह्मा भगवान् के अंश हैं और स्वायंभुव मनु ब्रह्मा के प्रत्यक्ष पुत्र थे। अब मैत्रेय मुनि मनु के उन वंशजों के विषय में बताने जा रहे हैं, जो सब के सब अपने पुण्यकर्मों के कारण विख्यात हुए हैं। इन पवित्र वंशजों के वर्णन के पूर्व वे अपवित्र कर्मोंवाले वंशजों का, जिनमें क्रोध, मृषा, दुरुक्ति, हिंसा, भय तथा मृत्यु मुख्य हैं, पहले ही वर्णन कर चुके हैं। अत: वे सोद्देश्य ही आगे ध्रुव महाराज का जीवन-इतिहास बताने जा रहे हैं, जो इस विश्व का सबसे बड़ा पुण्यात्मा राजा था।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥