श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक
विरक्तश्चेन्द्रियरतौ भक्तियोगेन भूयसा ।
तं निरन्तरभावेन भजेताद्धा विमुक्तये ॥ ६१ ॥
 
शब्दार्थ
विरक्त: च—पूर्णतया विरक्त; इन्द्रिय-रतौ—इन्द्रिय-तृप्ति के विषय में; भक्ति-योगेन—भक्ति की पद्धति से; भूयसा—अत्यन्त गम्भीरता से; तम्—उस (परम) को; निरन्तर—लगातार; भावेन—समाधि की सर्वोच्च अवस्था में; भजेत—पूजा करे; अद्धा— प्रत्यक्ष; विमुक्तये—मुक्ति के लिए ।.
 
अनुवाद
 
 यदि कोई मुक्ति के लिए अत्यन्त उत्सुक हो तो उसे दिव्य प्रेमाभक्ति की पद्धति का दृढ़ता से पालन करके चौबीसों घंटे समाधि की सर्वोच्च अवस्था में रहना चाहिए और उसे इन्द्रियतृप्ति के समस्त कार्यों से अनिर्वायत: पृथक् रहना चाहिए।
 
तात्पर्य
 विभिन्न व्यक्तियों के उद्देश्यों के अनुसार सिद्धि की विभिन्न अवस्थाएँ हैं। सामान्यत: मनुष्य कर्मी होते हैं, क्योंकि वे इन्द्रियतृप्ति के कार्यों में लगे रहते हैं। कर्मियों से ऊपर ज्ञानी हैं, जो भौतिक बन्धन से मुक्त होने का प्रयत्न करते रहते हैं। योगी इनसे भी अधिक उच्चस्थ हो चुके होते हैं, क्योंकि वे भगवान् के चरणकमलों का ध्यान करते रहते हैं। और इन सबसे ऊपर भक्तजन हैं, जो केवल भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति करते हैं। वे समाधि के उच्चतम पद पर गम्भीरता से स्थित होते हैं।

यहाँ पर ध्रुव महाराज को उपदेश दिया गया है कि यदि उनमें इन्द्रियतृप्ति के लिए कोई इच्छा नहीं है, तो उन्हें सीधे भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में लग जाना चाहिए। अपवर्ग अर्थात् मुक्ति का मार्ग, मोक्ष नामक अवस्था से प्रारम्भ होती है। इस श्लोक में विमुक्तये शब्द अर्थात् ‘मुक्ति के लिए’ विशेष रूप से आया है। यदि मनुष्य इस भौतिक जगत में प्रसन्न रहना चाहता है, तो वह ऐसे विभिन्न भौतिक लोकों में जाने की इच्छा व्यक्त कर सकता है जहाँ इन्द्रियतृप्ति का स्तर अधिक ऊँचा हो—किन्तु वास्तविक मोक्ष तो बिना किसी आकांक्षा के ही प्राप्त होता है। इसकी व्याख्या भक्तिरसामृत-सिन्धु में अन्याभिलाषिता शून्यम् पद, अर्थात् “भौतिक इन्द्रिय सुख की आकांक्षा से रहित” से की गई है।” जो व्यक्ति अब भी विभिन्न अवस्थाओं में या लोकों में भौतिक जीवन भोगना चाहते हैं, उनके लिए भक्तियोग में मुक्ति की अवस्था की संस्तुति नहीं की जाती है। जो लोग पूरी तरह इन्द्रियतृप्ति के कल्मष से मुक्त हैं, वे अत्यन्त शुद्धतापूर्वक भक्तियोग करते हैं। अपवर्ग के मार्ग की धर्म, अर्थ तथा काम तक की क्रियाएँ सब इन्द्रियतृप्ति के लिए होती हैं, किन्तु जब मनुष्य मोक्ष की अवस्था को प्राप्त होता है, तो अभ्यास करनेवाला भगवान् के साथ तादात्म्य करना चाहता है। किन्तु वह भी इन्द्रियतृप्ति है। किन्तु जब मनुष्य मुक्ति अवस्था से ऊपर उठता है, तो वह दिव्य प्रेमाभक्ति करने के लिए भगवान् के पार्षदों में से एक बन जाता है। यह पारिभाषिक रूप में विमुक्ति कहलाती है। इस विशिष्ट विमुक्ति के लिए नारद मुनि की संस्तुति है कि मनुष्य सीधे भक्ति में लग जाए।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥