श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक
तपोवनं गते तस्मिन्प्रविष्टोऽन्त:पुरं मुनि: ।
अर्हितार्हणको राज्ञा सुखासीन उवाच तम् ॥ ६३ ॥
 
शब्दार्थ
तप:-वनम्—वह वन मार्ग जहाँ ध्रुव महाराज ने तपस्या की; गते—इस प्रकार पास जाने पर; तस्मिन्—वहाँ; प्रविष्ट:—प्रवेश करके; अन्त:-पुरम्—व्यक्तिगत घर के भीतर; मुनि:—नारद मुनि; अर्हित—पूजित होकर; अर्हणक:—आदरपूर्ण आचरण के द्वारा; राज्ञा—राजा द्वारा; सुख-आसीन:—अपने आसन पर सुखपूर्वक बैठा; उवाच—कहा; तम्—उस (राजा) से ।.
 
अनुवाद
 
 जब ध्रुव भक्ति करने के लिए मधुवन में प्रविष्ट हो गए तब महर्षि नारद ने राजा के पास जाकर यह देखना उचित समझा कि वे महल के भीतर कैसे रह रहे हैं। जब नारद मुनि वहाँ पहुँचे तो राजा ने उन्हें प्रणाम करके उनका समुचित स्वागत किया। आराम से बैठ जाने पर नारद कहने लगे।
 
 
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