श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक
नारद उवाच
राजन् किं ध्यायसे दीर्घं मुखेन परिशुष्यता ।
किं वा न रिष्यते कामो धर्मो वार्थेन संयुत: ॥ ६४ ॥
 
शब्दार्थ
नारद: उवाच—नारद मुनि ने कहा; राजन्—हे राजा; किम्—क्या; ध्यायसे—सोचते हुए; दीर्घम्—अत्यन्त गहनता से; मुखेन— अपने मुँह से; परिशुष्यता—सूखते हुए; किम् वा—अथवा; न—नहीं; रिष्यते—खो जाना; काम:—इन्द्रियतृप्ति; धर्म:—धार्मिक अनुष्ठान; वा—या; अर्थेन—आर्थिक विकास से; संयुत:—से युक्त ।.
 
अनुवाद
 
 महर्षि नारद ने पूछा : हे राजन्, तुम्हारा मुख सूख रहा दिखता है और ऐसा लगता है कि तुम दीर्घकाल से कुछ सोचते रहे हो। ऐसा क्यों है? क्या तुम्हें धर्म, अर्थ तथा काम के मार्ग का पालन करने में कोई बाधा हुई है?
 
तात्पर्य
 मानव सभ्यता की उन्नति की चार अवस्थाएँ हैं—धर्म, अर्थ, काम तथा कुछों के लिए मोक्ष। नारद मुनि ने राजा से उसकी मुक्ति के विषय में कुछ नहीं पूछा, बस इतना ही पूछा कि राज्य का प्रबन्ध कैसा है, जो तीन सिद्धान्तों के उन्नति के लिए हैं। चूँकि ऐसे कर्म करने वाले कभी मुक्ति में रुचि नहीं रखते, इसीलिए नारद ने राजा से इसके विषय में कुछ नहीं कहा। मुक्ति तो उन लोगों के लिए है जिन्होंने धार्मिक कृत्यों, आर्थिक विकास तथा इन्द्रियतृप्ति के प्रति सारी रुचि खो दी है।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥