श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक
राजोवाच
सुतो मे बालको ब्रह्मन् स्त्रैणेनाकरुणात्मना ।
निर्वासित: पञ्चवर्ष: सह मात्रा महान्कवि: ॥ ६५ ॥
 
शब्दार्थ
राजा उवाच—राजा ने उत्तर दिया; सुत:—पुत्र; मे—मेरा; बालक:—अल्प वयस वाला; ब्रह्मन्—हे ब्राह्मण; स्त्रैणेन—स्त्री में लिप्त रहने वाला; अकरुणा-आत्मना—कठोर हृदय; निर्वासित:—घर से निकाला गया; पञ्च-वर्ष:—पाँच वर्ष का बालक; सह—साथ; मात्रा—माता द्वारा; महान्—महापुरुष; कवि:—भक्त ।.
 
अनुवाद
 
 राजा ने उत्तर दिया : हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, मैं अपनी पत्नी में अत्यधिक आसक्त हूँ और मैं इतना पतित हूँ कि मैंने अपने पाँच वर्ष के बालक के प्रति भी दया भाव के व्यवहार का त्याग कर दिया। मैने उसे महात्मा तथा महान् भक्त होते हुए भी माता सहित निर्वासित कर दिया है।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में अनेक विशिष्ट शब्द आये हैं, जिन्हें ध्यानपूर्वक समझना होगा। राजा ने कहा कि अपनी पत्नी में लिप्त होने के कारण उसने दया करनी छोड़ दी। यह पत्नी के प्रति अत्यधिक आसक्ति के कारण हुआ। राजा के दो पत्नियाँ थीं—पहली पत्नी सुनीति और दूसरी सुरुचि। वह दूसरी पत्नी को अधिक चाहता था, अत: उसने ध्रुव महाराज के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया। ध्रुव द्वारा घर छोडक़र तपस्या करने का यही कारण था। यद्यपि पिता होने के कारण राजा पुत्र को भी चाहता था, किन्तु अपनी दूसरी पत्नी के प्रति अत्यधिक आसक्ति के कारण ध्रुव महाराज के प्रति प्रेम कुछ कम था। अब वह पश्चात्ताप कर रहा था कि उसने ध्रुव महाराज तथा उसकी माता सुनीति को एक प्रकार से घर से निकाल दिया था। ध्रुव महाराज तो जंगल चले गये, किन्तु उनकी माता राजा से उपेक्षित होकर एक प्रकार से निर्वासित कर दी गई थीं। राजा को पश्चात्ताप हो रहा था कि उसने अपने पाँच वर्ष के पुत्र को निकाल दिया था। पिता को चाहिए कि वह पुत्र तथा पत्नी को न तो निर्वासित करे, न उनके भरण-पोषण में लापरवाही बरते। दोनों की उपेक्षा करने के कारण राजा अत्यन्त दुखी था और उसका मुख मुरझाया हुआ था। मनुस्मृति के अनुसार मनुष्य को अपनी पत्नी तथा बच्चों का कभी परित्याग नहीं करना चाहिए। हाँ, यदि वे आज्ञाकारी न हों और गृहस्थ जीवन के नियमों का पालन न करें तो कभी-कभी उनका परित्याग कर दिया जाता है। किन्तु ध्रुव महाराज के साथ ऐसा न था। वे अत्यन्त शिष्ट तथा आज्ञाकारी थे, साथ ही महान् भक्त भी। ऐसे व्यक्ति की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए, किन्तु राजा ने बाध्य होकर उसे निर्वासित कर दिया था। अब वह अत्यन्त दुखी था।
 
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