श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक
नारद उवाच
मा मा शुच: स्वतनयं देवगुप्तं विशाम्पते ।
तत्प्रभावमविज्ञाय प्रावृङ्क्ते यद्यशो जगत् ॥ ६८ ॥
 
शब्दार्थ
नारद: उवाच—नारद मुनि ने कहा; मा—मत; मा—मत; शुच:—दुखी होओ; स्व-तनयम्—अपने पुत्र के लिए; देव-गुप्तम्— भगवान् द्वारा भली-भाँति रक्षित; विशाम्-पते—हे मानव समाज के स्वामी; तत्—उसका; प्रभावम्—प्रभाव; अविज्ञाय—बिना जाने; प्रावृङ्क्ते—चारों ओर फैला; यत्—जिसका; यश:—ख्याति; जगत्—संसार भर में ।.
 
अनुवाद
 
 महर्षि नारद ने उत्तर दिया: हे राजन्, तुम अपने पुत्र के लिए शोक मत करो। वह भगवान् द्वारा पूर्ण रूप से रक्षित है। यद्यपि तुम्हें उसके प्रभाव के विषय में सही-सही जानकारी नहीं है, किन्तु उसकी ख्याति पहले ही संसार भर में फैल चुकी है।
 
तात्पर्य
 कभी-कभी जब हम यह सुनते हैं कि बड़े-बड़े साधु तथा भक्त जंगल में जाकर भक्ति या ध्यान करते हैं, तो हमें आश्चर्य होता है कि कोई बिना किसी की देखभाल के जंगल में कैसे रह सकता है? किन्तु इसका जो उत्तर नारद मुनि देते हैं, वह यह है कि ऐसे व्यक्तियों के रक्षक भगवान् हैं। शरणागति या आत्मसमर्पण का अर्थ है स्वीकृति अथवा दृढ़ विश्वास कि शरणागत जीव जहाँ कहीं भी होगा श्रीभगवान् उसकी रक्षा करेंगे, वह कभी अरक्षित या अकेला नहीं होगा। ध्रुव के वत्सल पिता ने सोचा कि उसका छोटा बालक, जो अभी केवल पाँच वर्ष का है, जंगल में दयनीय स्थिति में होगा, किन्तु नारद मुनि ने उसे विश्वास दिलाया और कहा, “तुम्हें अपने पुत्र के प्रभाव के बारे में ठीक से जानकारी नहीं है।” जो कोई भी भक्ति करता है, वह इस विश्व में कहीं भी कभी अरक्षित नहीं रहता।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥