श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 71
 
 
श्लोक
तत्राभिषिक्त: प्रयतस्तामुपोष्य विभावरीम् ।
समाहित: पर्यचरद‍ृष्यादेशेन पूरुषम् ॥ ७१ ॥
 
शब्दार्थ
तत्र—तत्पश्चात्; अभिषिक्त:—स्नान करने के पश्चात्; प्रयत:—ध्यानपूर्वक; ताम्—उस; उपोष्य—उपवास करके; विभावरीम्— रात्रि; समाहित:—पूर्ण ध्यान से; पर्यचरत्—पूजा की; ऋषि—नारद ऋषि द्वारा; आदेशेन—आदेश के अनुसार; पूरुषम्— भगवान् की ।.
 
अनुवाद
 
 इधर, ध्रुव महाराज ने मधुवन पहुँचकर यमुना नदी में स्नान किया और उस रात्रि को अत्यन्त मनोयोग से उपवास किया। तत्पश्चात् वे नारद मुनि द्वारा बताई गई विधि से भगवान् की आराधना में मग्न हो गये।
 
तात्पर्य
 इस विशिष्ट श्लोक की महत्ता यह है कि ध्रुव महाराज ने अपने गुरु महर्षि नारद द्वारा बताई गई विधि के अनुसार कार्य किया। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती का भी यही उपदेश है कि यदि हम भगवान् के धाम को वापस जाने में सफल होना चाहते हैं, तो हमें गुरु के आदेशों के अनुसार गम्भीरतापूर्वक कार्य करना चाहिए। सिद्धि का यही मार्ग है। सिद्धि-प्राप्ति के विषय में तनिक भी चिन्ता नहीं होनी चाहिए, क्योंकि जो गुरु के आदेशों का पालन करता है, वह अवश्य ही सिद्धि प्राप्त करता है। हमारी एकमात्र चिन्ता यह होनी चाहिए कि गुरु के आदेश को कैसे पूरा किया जाय। गुरु अपने प्रत्येक शिष्य को विशेष आदेश देने में दक्ष होता है और यदि शिष्य उस आदेश को कार्य रूप में परिणत कर देता है, तो वही सिद्धि का मार्ग है।
 
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