श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 77
 
 
श्लोक
सर्वतो मन आकृष्य हृदि भूतेन्द्रियाशयम् ।
ध्यायन्भगवतो रूपं नाद्राक्षीत्किञ्चनापरम् ॥ ७७ ॥
 
शब्दार्थ
सर्वत:—सभी प्रकार से; मन:—मन को; आकृष्य—केन्द्रित करके; हृदि—हृदय में; भूत-इन्द्रिय-आशयम्—इन्द्रियों के आश्रय तथा विषयों; ध्यायन्—ध्यान करते हुए; भगवत:—भगवान् का; रूपम्—रूप, आकार; न अद्राक्षीत्—नहीं देखा; किञ्चन— कुछ भी; अपरम्—अन्य ।.
 
अनुवाद
 
 उन्होंने अपनी इन्द्रियों तथा उनके विषयों पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त कर लिया और इस तरह अपने मन को चारों ओर से खींच कर भगवान् के रूप पर स्थिर कर दिया।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर ध्यान के यौगिक नियमों की स्पष्ट व्याख्या की गई है। मनुष्य को मन अन्यत्र न लगाकर भगवान् के स्वरूप पर स्थिर करना होता है। इसका यह अर्थ नहीं कि किसी निर्गुण वस्तु में ध्यान केन्द्रित किया जाये या उसका ध्यान किया जाये। ऐसा करना समय का अपव्यय मात्र है, क्योंकि यह अनावश्यक रूप से कष्टदायक है जैसाकि भगवद्गीता में कहा गया है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥