श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 79
 
 
श्लोक
यदैकपादेन स पार्थिवार्भक
स्तस्थौ तदङ्गुष्ठनिपीडिता मही ।
ननाम तत्रार्धमिभेन्द्रधिष्ठिता
तरीव सव्येतरत: पदे पदे ॥ ७९ ॥
 
शब्दार्थ
यदा—जब; एक—एक; पादेन—पाँव से; स:—ध्रुव महाराज; पार्थिव—राजा का; अर्भक:—बालक; तस्थौ—खड़ा रहा; तत्-अङ्गुष्ठ—उनके अँगूठे से; निपीडिता—दब कर; मही—पृथ्वी; ननाम—नीचे झुकी; तत्र—तब; अर्धम्—आधा; इभ-इन्द्र— हाथियों का राजा; धिष्ठिता—स्थित; तरी इव—नाव के समान; सव्य-इतरत:—दाहिने तथा बाएँ; पदे पदे—पग-पग पर ।.
 
अनुवाद
 
 जब राजपुत्र ध्रुव महाराज अपने एक पाँव पर अविचलित भाव से खड़े रहे तो उनके पाँव के भार से आधी पृथ्वी उसी प्रकार नीचे चली गई जिस प्रकार कि हाथी के चढऩे से (पानी में) उस के प्रत्येक कदम से नाव कभी दाएँ हिलती है, तो कभी बाएँ।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक का सबसे महत्त्वपूर्ण पद पार्थिवार्भक: अर्थात् राजा का पुत्र है। जब ध्रुव घर पर थे तो राजपुत्र होते हुए भी वे अपने पिता की गोद में चढऩे से रोक दिये गये थे। किन्तु जब वे आत्म-साक्षात्कार अथवा भक्ति में आगे बढ़ गये तो वे अपने अँगूठे के भार से पृथ्वी को दबा सकते थे। सामान्य चेतना तथा कृष्णचेतना का यही अन्तर है। सामान्य चेतना में राजा के पुत्र को भी उसका पिता किसी वस्तु के लिए मना कर सकता है, किन्तु जब वही व्यक्ति हृदय में कृष्णचेतना से युक्त हो जाता है, तो अपने अँगूठे की दाब से पृथ्वी को धकेल सकता है।

कोई यह तर्क नहीं कर सकता “वही ध्रुव जिन्हें पिता की गोद में चढऩे से मना कर दिया गया था सारी पृथ्वी को किस प्रकार हिला सकते थे?” इस तर्क को विद्वान् पसन्द नहीं करते, क्योंकि यह नग्नमातृका तर्कशास्त्र का उदाहरण है। इस तर्क से कोई यह सोच सकता है कि चूँकि माता बचपन में नंगी रहती थी, इसलिए उसे तरुण होने पर भी नंगी रहना चाहिए। ध्रुव महाराज की विमाता इसी प्रकार सोचती रही होगी, क्योंकि उसने ध्रुव को पिता की गोद में नहीं चढऩे दिया था, अत: वह अब क्यों मानने लगी कि ध्रुव के भार से पूरी धरती हिलने लगी? वह अवश्य ही अत्यधिक आश्चर्यचकित हुई होगी जब उसने जाना होगा कि भगवान् का निरन्तर ध्यान धरने से ध्रुव महाराज पृथ्वी को उसी प्रकार दबा सकते थे, जिस प्रकार नाव पर चढऩे पर हाथी नाव को दबाता है।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥