श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक
जाये उत्तानपादस्य सुनीति: सुरुचिस्तयो: ।
सुरुचि: प्रेयसी पत्युर्नेतरा यत्सुतो ध्रुव: ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
जाये—दोनों पत्नियों के; उत्तानपादस्य—उत्तानपाद की; सुनीति:—सुनीति; सुरुचि:—सुरुचि; तयो:—उन दोनों से; सुरुचि:— सुरुचि; प्रेयसी—अत्यन्त प्रिय; पत्यु:—पति की; न इतरा—दूसरी वाली नहीं; यत्—जिसका; सुत:—पुत्र; ध्रुव:—ध्रुव ।.
 
अनुवाद
 
 उत्तानपाद के दो रानियाँ थीं—सुनीति तथा सुरुचि। इनमें से सुरुचि राजा को अत्यन्त प्रिय थी। सुनीति, जिसका पुत्र ध्रुव था, राजा को इतनी प्रिय न थी।
 
तात्पर्य
 मैत्रेय राजाओं के पुण्य कार्यों का वर्णन करना चाह रहे थे। स्वायंभुव मनु के प्रथम पुत्र प्रियव्रत थे और उत्तानपाद, दूसरे पुत्र थे किन्तु मैत्रेय मुनि ने तुरन्त ही उत्तानदपाद के पुत्र ध्रुव महाराज का वृत्तान्त प्रारम्भ कर दिया, क्योंकि मैत्रेय पुण्य-कार्यों के वर्णन के लिए आतुर थे। ध्रुव महाराज के जीवन की घटनाएँ भक्तों के लिए अत्यन्त मोहक हैं। उनके पवित्र कार्यों से शिक्षा लेकर कोई भी अपने आपको भौतिकता से विलग करके कठिन तपस्या द्वारा भक्तिमय सेवा को बढ़ा सकता है। ध्रुव के पवित्र कार्यकलापों को सुनकर ईश्वर के प्रति श्रद्धाभाव बढ़ाया जा सकता है और भगवान् से प्रत्यक्ष सम्बध स्थापित करके भक्ति के दिव्य पद को प्राप्त किया जा सकता है। ध्रुव महाराज की तपस्याओं के उदाहरण श्रोताओं के हृदयों में तुरन्त भक्तिभाव उत्पन्न कर सकते हैं।
 
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