श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 8: ध्रुव महाराज का गृहत्याग और वनगमन  »  श्लोक 81

 
श्लोक
देवा ऊचु:
नैवं विदामो भगवन् प्राणरोधं
चराचरस्याखिलसत्त्वधाम्न: ।
विधेहि तन्नो वृजिनाद्विमोक्षं
प्राप्ता वयं त्वां शरणं शरण्यम् ॥ ८१ ॥
 
शब्दार्थ
देवा: ऊचु:—देवताओं ने कहा; न—नहीं; एवम्—इस प्रकार; विदाम:—हम समझ पाते हैं; भगवन्—हे भगवान्; प्राण रोधम्—रुद्ध हुआ श्वास; चर—चलता हुआ; अचरस्य—अचल का; अखिल—विश्वजनीन; सत्त्व—अस्तित्व; धाम्न:—आगार; विधेहि—कृपा करके जो आवश्यक हो करें; तत्—अत:; न:—हमारा; वृजिनात्—संकट से; विमोक्षम्—उद्धार; प्राप्ता:— निकट आता; वयम्—हम सभी; त्वाम्—तुमको; शरणम्—शरण; शरण्यम्—शरण ग्रहण की जाने योग्य ।.
 
अनुवाद
 
 देवताओं ने कहा : हे भगवान्, आप समस्त जड़ तथा चेतन जीवात्माओं के आश्रय हैं। हमें लग रहा है कि सभी जीवों का दम घुट रहा है और उनकी श्वास-क्रिया अवरुद्ध हो गई है। हमें ऐसा अनुभव कभी नहीं हुआ। आप सभी शरणागतों के चरम आश्रय है, अत: हम आपके पास आये हैं। कृपया हमें इस संकट से उबारिये।
 
तात्पर्य
 भगवान् की भक्ति के फलस्वरूप प्राप्त ध्रुव महाराज के प्रभाव का अनुभव देवताओं को भी हो रहा था, जिन्होंने इसके पूर्व कभी ऐसा अनुभव नहीं किया था। ध्रुव महाराज के श्वास रोक लिये जाने पर सारे संसार की श्वास-क्रिया रुद्ध हो गई। भगवान् की इच्छा न हो तो भौतिक जीव श्वास नहीं ले पाते जबकि दिव्य आत्माएँ श्वास ले सकती हैं। भौतिक जीव तो भगवान् की बहिरंगा शक्ति के प्रतिफल हैं, जबकि दिव्य आत्माएँ अन्तरंगा शक्ति के। देवतागण दोनों प्रकार के जीवों के नियन्ता भगवान् के पास यह जानने के लिऐ गये कि उनके श्वास क्यों रुद्ध हो रहे हैं। इस जगत में सभी प्रकार की समस्याओं
के हल के लिए परमेश्वर अन्तिम लक्ष्य हैं। आध्यात्मिक जगत में कोई समस्या नहीं रहती, किन्तु भौतिक जगत तो समस्याओं से भरा हुआ है। चूँकि भगवान् दोनों जगतों के स्वामी हैं, अत: समस्याएँ उत्पन्न होने पर उन्हीं के पास पहुँचना श्रेयस्कर है। जो भक्त हैं, उनके पास इस जगत में कोई समस्या नहीं है। विश्वं पूर्णसुखायते (चैतन्य चरितामृत)—भक्तगण समस्त समस्याओं से मुक्त हैं क्योंकि वे भगवान् के पूर्ण शरणागत हैं। भक्त के लिए इस संसार में प्रत्येक वस्तु अत्यन्त आनन्द दायक है, क्योंकि उसको वह भगवान् की दिव्य भक्ति के लिए उपयोग में लाना जानता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥