श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 9: ध्रुव महाराज का घर लौटना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक
मैत्रेय उवाच
त एवमुत्सन्नभया उरुक्रमे
कृतावनामा: प्रययुस्त्रिविष्टपम् ।
सहस्रशीर्षापि ततो गरुत्मता
मधोर्वनं भृत्यदिद‍ृक्षया गत: ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
मैत्रेय: उवाच—मैत्रेय मुनि ने कहा; ते—देवतागण; एवम्—इस प्रकार; उत्सन्न-भया:—समस्त प्रकार के डर से रहित; उरुक्रमे—भगवान् को, जिनके कार्य अलौलिक हैं; कृत-अवनामा:—नमस्कार किये गये; प्रययु:—वे लौट गये; त्रि विष्टपम्—अपने अपने दैव लोकों को; सहस्र-शीर्षा अपि—सहस्रशीर्ष कहलानेवाले भगवान् भी; तत:—वहाँ से; गरुत्मता— गरुड़ पर आरुढ़ होकर; मधो: वनम्—मधुवन; भृत्य—दास; दिदृक्षया—देखने की इच्छा से; गत:—गये ।.
 
अनुवाद
 
 महर्षि मैत्रेय ने विदुर से कहा : जब भगवान् ने देवताओं को इस प्रकार फिर से आश्वासन दिलाया तो वे समस्त प्रकार के भय से मुक्त हो गये और वे सब उन्हें नमस्कार करके अपने- अपने देवलोकों को चले गये। तब भगवान्, जो साक्षात् सहस्रशीर्ष अवतार हैं, गरुड़ पर सवार हुए और अपने दास ध्रुव को देखने के लिए मधुवन गये।
 
तात्पर्य
 सहस्रशीर्ष शब्द गर्भोदकशायी विष्णु के लिए प्रयुक्त हुआ है। यद्यपि भगवान् क्षीरोदकशायी विष्णु के रूप में प्रकट हुए थे, किन्तु उन्हें यहाँ गर्भोदकशायी सहस्रशीर्ष विष्णु के रूप में वर्णित किया गया है क्योंकि वे गर्भोदकशायी विष्णु से अभिन्न हैं। श्रील सनातन गोस्वामी ने अपने भागवतामृत में विष्णु के इस रूप को पृश्निगर्भ अवतार बतलाया है। उन्होंने ध्रुव महाराज के रहने के लिए ध्रुवलोक की सृष्टि की।
 
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