श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 9: ध्रुव महाराज का घर लौटना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक
ते न स्मरन्त्यतितरां प्रियमीश मर्त्यं
ये चान्वद: सुतसुहृद्गृहवित्तदारा: ।
ये त्वब्जनाभ भवदीयपदारविन्द
सौगन्ध्यलुब्धहृदयेषु कृतप्रसङ्गा: ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
ते—वे; न—कभी नहीं; स्मरन्ति—स्मरण करते हैं; अतितराम्—अत्यधिक; प्रियम्—प्रिय; ईश—हे भगवान्; मर्त्यम्—भौतिक देह; ये—जो; च—भी; अनु—के अनुसार; अद:—वह; सुत—पुत्र; सुहृत्—मित्र; गृह—घर; वित्त—सम्पत्ति; दारा:—पत्नी; ये—जो; तु—लेकिन; अब्ज-नाभ—हे कमलनाभि वाले भगवान्; भवदीय—आपका; पद-अरविन्द—चरणकमल; सौगन्ध्य—सुगन्धि; लुब्ध—आकृष्ट; हृदयेषु—भक्तों सहित, जिनके हृदय; कृत-प्रसङ्गा:—संगति करते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 हे कमलनाभ भगवान्, यदि कोई व्यक्ति किसी ऐसे भक्त की संगति करता है, जिसका हृदय सदैव आपके चरणकमलों की सुगन्ध में लुब्ध रहता है, तो वह न तो कभी अपने भौतिक शरीर के प्रति आसक्त रहता है और न सन्तति, मित्र, घर, सम्पति तथा पत्नी के प्रति देहात्मबुद्धि रखता है, जो भौतिकतावादी पुरुषों को अत्यन्त ही प्रिय हैं। वस्तुत: वह उनकी तनिक भी परवाह नहीं करता।
 
तात्पर्य
 भक्ति का विशेष लाभ यह है कि भक्त लोग न केवल भगवान् की दिव्य लीलाओं का कीर्तन तथा श्रवण करने और उनकी स्तुति करने से आनन्द लेते हैं वरन् वे अपने शरीर के प्रति अनासक्त रहते हैं जबकि योगी लोग अपने शरीर के प्रति अत्यधिक आसक्त रहकर सोचते हैं कि वे यौगिक क्रियाओं का अभ्यास करते हुए आत्म-चेतना में आगे बढ़ सकेंगे। सामान्यत: योगियों की भक्ति के प्रति अधिक रुचि नहीं होती। वे तो प्राणायाम को ही नियमित करना चाहते हैं। यह मात्र शारीरिक व्यापार है। यहाँ पर ध्रुव महाराज स्पष्ट कहते हैं कि भक्त को शरीर के प्रति कोई रुचि नहीं रहती। वह जानता रहता है कि वह शरीर नहीं है। अत: प्रारम्भ से ही वह आसन करने में समय न गँवाकर शुद्ध भक्त की खोज करके उसकी संगति करता है और आत्म-चेतना में योगी से आगे निकल जाता है। चूँकि भक्त जानता है कि वह शरीर नहीं है, अत: वह शारीरिक सुख अथवा दुख से प्रभावित नहीं होता। वह स्त्री, सन्तान, घर, सम्पत्ति इत्यादि से किसी प्रकार का शारीरीक सम्बन्ध नहीं रखता और न इनसे मिलनेवाले सुख अथवा दुख में रुचि रखता है। भक्त होने का यही विशेष लाभ है। जीवन की यह अवस्था तभी प्राप्त होती है, जब कोई व्यक्ति शुद्ध भक्त की जो भगवान् के चरणकमलों की सुगन्धि कर सदैव आनन्द उठाता है, संगति करने के लिए इच्छुक होता है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥