श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 9: ध्रुव महाराज का घर लौटना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक
तिर्यङ्‌नगद्विजसरीसृपदेवदैत्य
मर्त्यादिभि: परिचितं सदसद्विशेषम् ।
रूपं स्थविष्ठमज ते महदाद्यनेकं
नात: परं परम वेद्मि न यत्र वाद: ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
तिर्यक्—पशुओं; नग—वृक्ष; द्विज—पक्षी; सरीसृप—रेंगनेवाले जीव; देव—देवता; दैत्य—असुर; मर्त्य-आदिभि:—मनुष्यों इत्यादि के द्वारा.; परिचितम्—परिव्याप्त; सत्-असत्-विशेषम्—प्रकट तथा अप्रकट योनियों द्वारा; रूपम्—रूप; स्थविष्ठम्— स्थूल विश्व का; अज—हे अजन्मा; ते—तुम्हारा; महत्-आदि—सम्पूर्ण भौतिक शक्ति से उत्पन्न.; अनेकम्—अनेक कारण; न— नहीं; अत:—इससे; परम्—दिव्य; परम—हे परम; वेद्मि—जानता हूँ; न—नहीं; यत्र—जहाँ; वाद:—विभिन्न तर्क ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवन्, हे परम अजन्मा, मैं जानता हूँ कि जीवात्माओं की विभिन्न योनियाँ, यथा पशु, पक्षी, रेंगनेवाले जीव, देवता तथा मनुष्य सारे ब्रह्माण्ड में फैली हुई हैं, जो समग्र भौतिक शक्ति से उत्पन्न हैं। मैं यह भी जानता हूँ कि ये कभी प्रकट रूप में रहती हैं, तो कभी अप्रकट रूप में, किन्तु मैने ऐसा परम रूप कभी नहीं देखा जैसा कि अब आप का देख रहा हूँ। अब किसी भी सिद्धान्त के बनाने की आवश्यकता नहीं रह गई है।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं कि वे ब्रह्माण्ड भर में व्याप्त हैं किन्तु यद्यपि प्रत्येक वस्तु उन्हीं पर टिकी है, तो भी वे पृथक् रहते हैं। उसी विचार को यहाँ पर ध्रुव महाराज ने व्यक्त किया है। वे कहते हैं कि भगवान् के दिव्य रूप को देखने के पूर्व वे केवल भौतिक रूपों की किस्मों से, जिनकी संख्या चौरासी लाख है, परिचित थे। तथ्य तो यह है कि जब तक भगवान् की भक्ति नहीं की जाती, तब तक भगवान् के अनन्तिम रूप को नहीं समझा जा सकता। इसकी पुष्टि भगवद्गीता (१८.५५) में भी हुई है। भक्त्या माम् अभिजानाति—भक्ति के अतिरिक्त अन्य किसी साधन से परम सत्य परमेश्वर को ठीक से नहीं जाना जा सकता।

यहाँ पर ध्रुव महाराज अपने ज्ञान की प्रारम्भिक अवस्था की तुलना परमेश्वर की उपस्थिति में ज्ञान की पूर्णता से करते हैं। जीवात्मा का काम सेवा करना है। जब तक वह भगवान् को जान लेने की स्थिति में नहीं आ जाता, तब तक वह नाना प्रकार के वृक्षों, सरीसृपों, पशुओं, मनुष्यों, देवताओं इत्यादि की सेवा में लगा रहता है। आम अनुभव यह है कि कोई मनुष्य कुत्ते की सेवा करता है, तो कोई पौधे तथा लताओं की सेवा करता है, कोई देवताओं की सेवा करता है, तो कोई मानवता की अथवा अपने दफ्तर के अधिकारी की, किन्तु कोई भी कृष्ण की सेवा नहीं करता है। सामान्य जन को छोड़ भी दे, आध्यात्मिक ज्ञान में ऊपर उठे हुए व्यक्ति भी अधिक से अधिक विराट् रूप की सेवा में लगे रहते हैं, अथवा भगवान् के परम रूप को न समझ सकने के कारण ध्यान के द्वारा शून्यवाद की पूजा करते हैं। तथापि ध्रुव महाराज को तो परमेश्वर का आशीर्वाद मिल गया था। जब भगवान् ने उनके मस्तक पर अपना शंख छुवाया तो वास्तविक ज्ञान अन्त:करण से प्रकट हुआ और ध्रुव महाराज भगवान् के दिव्य रूप को समझ सके। यहाँ पर ध्रुव महाराज स्वीकार करते हैं कि वे न केवल अज्ञानी ही थे, वरन् उम्र में भी बालक थे। यदि भगवान् ने उनको आशीर्वाद न दिया होता तो अबोध बालक के लिए भगवान् के परम रूप को पहचान पाना सम्भव न हो पाता।

 
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