श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 9: ध्रुव महाराज का घर लौटना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक
यस्मिन्विरुद्धगतयो ह्यनिशं पतन्ति
विद्यादयो विविधशक्तय आनुपूर्व्यात् ।
तद्ब्रह्म विश्वभवमेकमनन्तमाद्य-
मानन्दमात्रमविकारमहं प्रपद्ये ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
यस्मिन्—जिसमें; विरुद्ध-गतय:—विरोधी स्वभाव का; हि—निश्चय ही; अनिशम्—सदैव; पतन्ति—प्रकट हैं; विद्या- आदय:—ज्ञान तथा अविद्या इत्यादि.; विविध—विभिन्न; शक्तय:—शक्तियाँ; आनुपूर्व्यात्—सतत; तत्—उस; ब्रह्म—ब्रह्म; विश्व-भवम्—भौतिक उत्पत्ति का कारण; एकम्—एक; अनन्तम्—अपार; आद्यम्—आदि; आनन्द-मात्रम्—केवल आनन्दमय; अविकारम्—अपरिवर्तित; अहम्—मैं; प्रपद्ये—नमस्कार करता हूँ ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवन्, ब्रह्म के आप के निर्गुण प्राकट्य में सदैव दो विरोधी तत्त्व रहते हैं—ज्ञान तथा अविद्या। आपकी विविध शक्तियाँ निरन्तर प्रकट होती हैं, किन्तु निर्गुण ब्रह्म, जो अविभाज्य, आदि, अपरिवर्तित, असीम तथा आनन्दमय है, भौतिक जगत का कारण है। चूँकि आप वही निर्गुण ब्रह्म हैं, अत: मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।
 
तात्पर्य
 ब्रह्म-संहिता में कहा गया है कि असीम निर्गुण ब्रह्म गोविन्द के दिव्य शरीर का तेज है। इस असीम तेजमण्डल में असंख्य ब्रह्माण्ड हैं, जो विभिन्न कोटि के असंख्यों लोकों से युक्त हैं। यद्यपि परम पुरुष सब कारणों के मूल कारण हैं, किन्तु उनका निर्गुण तेज, जिसे ब्रह्म कहा जाता है, भौतिक जगत का तत्कालिक कारण है। अत: ध्रुव महाराज ने भगवान् के निर्गुण रूप को नमस्कार किया। जो निर्गुण स्वरूप का अनुभव करता है, वह अपरिवर्तनीय ब्रह्मानन्द का उपभोग करता है, जिसे यहाँ पर आत्म-आनन्द कहा गया है।

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं कि यह निर्गुण रूप या ब्रह्म का स्वरूप उन व्यक्तियों के लिए है, जो अत्यन्त ज्ञानी हैं, किन्तु व्यक्तिगत स्वरूपों या आध्यात्मिक जगत की विभिन्नता को नहीं समझ पाते। ऐसे भक्त ज्ञान-मिश्र भक्त कहलाते हैं, अर्थात् उनकी भक्ति के साथ अनुभवगम्य ज्ञान मिश्रित रहता है। चूँकि निर्गुण ब्रह्म का बोध परम सत्य का आंशिक ज्ञान है, अत: ध्रुव महाराज सादर नमस्कार करते हैं।

कहा जाता है कि निर्गुण ब्रह्म परम सत्य का दूरस्थ साक्षात्कार है। यद्यपि ऊपर से ब्रह्म शक्तिशून्य प्रतीत होता है, किन्तु वस्तुत: विद्या तथा अविद्या के अन्तर्गत इसमें कई शक्तियाँ कार्यशील रहती हैं। इन्हीं शक्तियों के कारण विद्या तथा अविद्या निरन्तर प्रकट होती हैं। ईशोपनिषद् में विद्या तथा अविद्या का अत्यन्त सुन्दर वर्णन हुआ है। कहा गया है कि कभी-कभी अविद्या के कारण मनुष्य परम सत्य को पूर्णत: निर्गुण मान लेता है, किन्तु वास्तव में भक्ति के विकास के साथ ही निर्गुण तथा सगुण बोध का विकास होता रहता है। हमारी भक्ति जितनी विकसित होती है उतने ही हम परम सत्य के पास पहुँचते हैं, जब कि प्रारम्भ में दूरी अधिक होने के कारण वही निर्गुण प्रतीत होता है।

सामान्यत: लोग अविद्या शक्ति अथवा माया के वश में होने से न तो ज्ञान से युक्त होते हैं, न भक्ति से। किन्तु जब मनुष्य ज्ञानी बन जाता है, तो वह ज्ञान-मिश्र-भक्त की श्रेणी में पहुँच जाता है, अर्थात् उसका प्रेम ज्ञानमिश्रित होता है। जब वह कुछ आगे बढ़ता है, तो उसे बोध होता है कि परम सत्य अनेक शक्तियों से सम्पन्न एक पुरुष है। विद्वान् भक्त ही भगवान् तथा उनकी सृजन शक्ति को समझ सकता है। ज्यों ही वह परम सत्य की सृजन शक्ति को स्वीकार कर लेता है, त्योंही श्रीभगवान् के छहों ऐश्वर्य भी समझ में आ जाते हैं। जो भक्त इससे भी आगे बढ़े हुए हैं और पूर्ण ज्ञान को प्राप्त हैं, वे भगवान् का दिव्य आनन्द उठा सकते हैं। इस प्रसंग में विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने एक उदाहरण दिया है, जो लक्ष्य की ओर अग्रसर होते हुए एक मनुष्य का है। ज्यों-ज्यों वह पास आता है त्यों-त्यों वह लक्ष्य को दूरी से वैसे ही देखता है जैसे हम किसी शहर को दूरी से देखते हैं। उस समय उसे लगता है कि शहर दूर स्थित है, किन्तु वह ज्यों-ज्यों पास आता जाता है उसे मीनारें तथा झंडे दिखाई पडऩे लगते हैं। जब वह शहर के भीतर प्रवेश करता है, तो उसे विभिन्न मार्ग, वाटिकाएँ, सरोवर, बाजार तथा व्यापारी दिखाई पड़ते हैं। उसे सिनेमाघर तथा नाचते और उल्लास मनाते लोग मिलते हैं। इस प्रकार शहर के भीतर जाकर और स्वयं शहर के कार्यकलापों को देखकर वह सन्तुष्ट हो जाता है।

 
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