श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 9: ध्रुव महाराज का घर लौटना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक
सत्याशिषो हि भगवंस्तव पादपद्म-
माशीस्तथानुभजत: पुरुषार्थमूर्ते: ।
अप्येवमर्य भगवान्परिपाति दीनान्
वाश्रेव वत्सकमनुग्रहकातरोऽस्मान् ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
सत्य—वास्तविक; आशिष:—अन्य आशीर्वादों (वरों) की तुलना में; हि—निश्चय ही; भगवन्—हे भगवन्; तव—तुम्हारा; पाद-पद्मम्—चरणकमल; आशी:—वर; तथा—उस प्रकार से; अनुभजत:—भक्तों के लिए; पुरुष-अर्थ—जीवन के वास्तविक लक्ष्य का; मूर्ते:—साक्षात्; अपि—यद्यपि; एवम्—इस प्रकार; अर्य—हे श्रेष्ठ; भगवान्—श्रीभगवान्; परिपाति—पालन करता है; दीनान्—दीनों का; वाश्रा—गाय; इव—के समान; वत्सकम्—बछड़े को; अनुग्रह—कृपा करने के लिए; कातर:—उत्सुक; अस्मान्—मुझ पर ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवन्, हे परमेश्वर, आप सभी वरों के परम साक्षात् रूप हैं, अत: जो बिना किसी कामना के आपकी भक्ति पर दृढ़ रहता है, उसके लिए राजा बनने तथा राज करने की अपेक्षा आपके चरण-कमलों की रज श्रेयस्कर है। आपके चरणकमल की पूजा का यही वरदान है। आप अपनी अहैतुकी कृपा से मुझ जैसे अज्ञानी भक्त के लिए पूर्ण परिपालक हैं, जिस प्रकार गाय अपने नवजात बछड़े को दूध पिलाती है और हमले से उसकी रक्षा करके उसकी देखभाल करती है।
 
तात्पर्य
 ध्रुव महाराज को अपनी भक्ति के दोष का पता था। शुद्ध भक्ति का कोई भौतिक रूप नहीं होता और वह सकाम कर्मों अथवा मानसिक चिन्तन द्वारा पूरी नहीं होती। इसीलिए शुद्ध भक्ति अहैतुकी कहलाती है। ध्रुव महाराज जानते थे कि वे भक्ति में भगवान् की पूजा करने सोद्देश्य आये हैं—वे अपने पिता का राज्य चाहते थे। ऐसा मिश्रित भक्त कभी-कभी श्रीभगवान् का प्रत्यक्ष दर्शन नहीं कर सकता। अत: वे भगवान् की अहैतुकी कृपा के लिए परम कृतज्ञ थे। भगवान् इतने कृपालु हैं कि वे अविद्या के वशीभूत कृपा तथा भौतिक लाभ के इच्छुक भक्तों की समस्त कामनाओं को तो पूरा करते ही हैं, साथ ही भक्त की सभी प्रकार से रक्षा करते हैं, जिस प्रकार गाय नवजात बछड़े को दूध पिलाती है। भगवद्गीता में कहा गया है कि भगवान् अपनी भक्ति में लगे हुए भक्तों को बुद्धि प्रदान करते हैं जिससे वे बिना कठिनाई के इन तक पहुँच सकें। भक्तों को भक्ति के प्रति अत्यन्त निष्ठावान होना चाहिए। फिर चाहे भक्त में कितने ही दोष क्यों न हों, श्रीकृष्ण उसे मार्गदर्शन करते हुए भक्ति के उच्च पद तक पहुँचा देंगे।

ध्रुव महाराज ने यहाँ पर भगवान् को पुरुषार्थ मूर्ति कहा है, जिसका अर्थ है जीवन का चरम उद्देश्य। सामान्य रूप से पुरुषार्थ का अर्थ है भौतिक वर प्राप्त करने के लिए धर्म या भगवान् की पूजा करना। भौतिक वरदान प्राप्त करने के लिए प्रार्थना इसलिए की जाती है कि इन्द्रियों की तुष्टि हो सके और जब मनुष्य निराश हो जाता है और लाख प्रयत्न के बाद भी अपनी इन्द्रियतुष्टि नहीं कर पाता तो वह मुक्ति की कामना करता है। ये कार्य सामान्यत: पुरुषार्थ कहलाते हैं। किन्तु वास्तविक चरम उद्देश्य तो भगवान् को समझना है। यह पञ्चम पुरुषार्थ कहलाता है। इसीलिए भगवान् चैतन्य ने शिक्षा दी है कि मनुष्य को भगवान् से भौतिक सम्पत्ति, ख्याति या सुपत्नी जैसे वरदान नहीं माँगने चाहिए, उसे तो भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में निरन्तर लगे रहने की प्रार्थना करनी चाहिए। ध्रुव महाराज अपनी भौतिक लाभ की इच्छाओं से अवगत थे, अत: भगवान् का संरक्षण चाह रहे थे जिससे वे भौतिक इच्छाओं के कारण भक्ति से विपथ न हो सकें।

 
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