श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 9: ध्रुव महाराज का घर लौटना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक
श्रीभगवानुवाच
वेदाहं ते व्यवसितं हृदि राजन्यबालक ।
तत्प्रयच्छामि भद्रं ते दुरापमपि सुव्रत ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-भगवान् उवाच—श्रीभगवान् ने कहा; वेद—जानता हूँ; अहम्—मैं; ते—तुम्हारा; व्यवसितम्—दृढ संकल्प; हृदि—हृदय के भीतर; राजन्य-बालक—हे राजा के पुत्र; तत्—वह; प्रयच्छामि—तुम्हें दूँगा; भद्रम्—समस्त कल्याण; ते—तुमको; दुरापम्— यद्यपि प्राप्त करना कठिन है, दुर्लभ; अपि—तो भी; सु-व्रत—जिसने पवित्र व्रत धारण कर रखा है ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ने कहा : हे राजपुत्र ध्रुव, तुमने पवित्र व्रतों का पालन किया है और मैं तुम्हारी आन्तरिक इच्छा भी जानता हूँ। यद्यपि तुम अत्यन्त महत्वाकांक्षी हो और तुम्हारी इच्छा को पूरा कर पाना कठिन है, तो भी मैं उसे पूरा करूँगा। तुम्हारा कल्याण हो।
 
तात्पर्य
 भगवान् अपने भक्त के प्रति इतने दयालु होते हैं कि उन्होंने ध्रुव महाराज से तुरन्त कहा कि तुम्हारा कल्याण हो। वास्तव में भक्त ध्रुव मन ही मन अत्यन्त भयभीत थे, क्योंकि भक्ति करते हुए उन्होंने भौतिक लाभ की कामना की थी जिसके कारण ईश्वर प्रेम की अवस्था तक पहुँचने में उन्हें बाधा हो रही थी। भगवद्गीता (२.४४) में कहा गया है—भोगैश्वर्यप्रसक्तानाम्—जो लोग भौतिक सुख के प्रति आसक्त हैं, वे भक्ति की ओर आकर्षित नहीं हो सकते। यह तो सच है कि ध्रुव महाराज हृदय से ऐसा राज्य चाह रहे थे, जो ब्रह्मलोक से भी श्रेष्ठ हो। एक क्षत्रिय की यह स्वाभाविक आकांक्षा होती है। ध्रुव केवल पाँच वर्ष के बालक थे, अत: लडक़पन के कारण वे अपने पिता तथा परपितामह से भी बड़े साम्राज्य की आकांक्षा कर रहे थे। उनके पिता उत्तानपाद मनु के पुत्र थे और मनु ब्रह्मा के पुत्र थे। ध्रुव इन पारिवारिक सदस्यों से आगे बढ़ जाना चाह रहे थे। भगवान् को ध्रुव की नादान आकांक्षा का पता था, तो फिर उन्हें किस प्रकार ब्रह्मा से भी उच्च पद प्रदान किया जा सका? भगवान् ने ध्रुव महाराज को आश्वस्त किया कि वे भगवत्प्रेम से विलग नहीं होंगे। उन्होंने ध्रुव को इस बात की चिन्ता न करने के लिए कहा कि भौतिक आकांक्षाओं के साथ ही वे महान् भक्त बनने की भी महत्त्वाकांक्षा रखते थे। सामान्यत: भगवान् शुद्ध भक्त को भौतिक ऐश्वर्य नहीं प्रदान करते, भले ही वह उसके लिए इच्छुक हो। लेकिन ध्रुव का मामला भिन्न था। भगवान् जान रहे थे कि वह इतना बड़ा भक्त है कि ऐश्वर्य के होने पर भी वह भगवत्प्रेम से विचलित नहीं होगा। इस उदाहरण से यह सिद्ध हो जाता है कि अत्यन्त योग्य भक्त भौतिक सुख की सुविधा के साथ ही भगवत्प्रेम भी कर सकता है। किन्तु यह एक विशेष दशा थी।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
About Us | Terms & Conditions
Privacy Policy | Refund Policy
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥