श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 9: ध्रुव महाराज का घर लौटना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक
स वै धिया योगविपाकतीव्रया
हृत्पद्मकोशे स्फुरितं तडित्प्रभम् ।
तिरोहितं सहसैवोपलक्ष्य
बहि:स्थितं तदवस्थं ददर्श ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
स:—ध्रुव महाराज; वै—भी; धिया—ध्यान से; योग-विपाक-तीव्रया—प्रखर योगाभ्यास के कारण; हृत्—हृदय के; पद्म- कोशे—कमल पर; स्फुरितम्—प्रकट; तडित्-प्रभम्—बिजली के समान तेजमय; तिरोहितम्—विलीन हुई; सहसा—अकस्मात्; एव—भी; उपलक्ष्य—देखकर; बहि:-स्थितम्—बाहर स्थित; तत्-अवस्थम्—उसी मुद्रा में; ददर्श—देख सका ।.
 
अनुवाद
 
 ध्रुव महाराज अपने प्रखर योगाभ्यास के समय भगवान् के जिस बिजली सदृश तेजमान रूप के ध्यान में निमग्न थे, वह सहसा विलीन हो गया। फलत: ध्रुव अत्यन्त विचलित हो उठे और उनका ध्यान टूट गया। किन्तु ज्योंही उन्होंने अपने नेत्र खोले, वैसे ही उन्होंने अपने समक्ष पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को उसी रूप में साक्षात् उपस्थित देखा, जिस रूप का दर्शन वे अपने हृदय में कर रहे थे।
 
तात्पर्य
 अपने प्रखर योगमय ध्यान के कारण ध्रुव महाराज अपने हृदय में भगवान् के जिस स्वरूप का निरन्तर दर्शन कर रहे थे, किन्तु सहसा अपने हृदय से इस रूप के विलुप्त होने पर उन्होंने सोचा कि उस रूप को उन्होंने खो दिया है। इससे ध्रुव महाराज चिन्तित हुए, किन्तु आँख खुलने तथा ध्यान टूटने पर उन्होंने देखा कि भगवान् का वही रूप उनके समक्ष उपस्थित है। ब्रह्म संहिता में (५.३८) कहा गया है—प्रेमाञ्जनच्छुरितभक्तिविलोचनेन—जिस सत्पुरुष ने अपनी भक्ति द्वारा ईश्वर के प्रति प्रेम उत्पन्न कर लिया है, वह श्यामसुन्दर के दिव्य रूप का निरन्तर दर्शन करता है। भक्त के हृदय में स्थित श्यामसुन्दर का यह रूप काल्पनिक नहीं होता। जब भक्त की भक्ति प्रौढ़ हो जाती है, तो वह अपनी भक्ति की अवधि में जिस रूप का चिन्तन करता रहता है, वही श्यामसुन्दर सामने दिखता है। चूँकि परमेश्वर परम है, अत: चाहे भक्त के हृदय का रूप हो या मन्दिर में स्थित रूप हो अथवा वैकुठधाम वृन्दावन में स्थित आदि रूप हो, ये सभी एक ही होते हैं। वे एक दूसरे से अभिन्न होते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥