श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 9: ध्रुव महाराज का घर लौटना  »  श्लोक 20-21
 
 
श्लोक  4.9.20-21 
नान्यैरधिष्ठितं भद्र यद्भ्राजिष्णु ध्रुवक्षिति ।
यत्र ग्रहर्क्षताराणां ज्योतिषां चक्रमाहितम् ॥ २० ॥
मेढ्यां गोचक्रवत्स्थास्‍नु परस्तात्कल्पवासिनाम् ।
धर्मोऽग्नि: कश्यप: शुक्रो मुनयो ये वनौकस: ।
चरन्ति दक्षिणीकृत्य भ्रमन्तो यत्सतारका: ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; अन्यै:—अन्यों के द्वारा; अधिष्ठितम्—शासित; भद्र—मेरे अच्छे बालक; यत्—जो; भ्राजिष्णु—देदीप्यमान; ध्रुव क्षिति—ध्रुवलोक नामक स्थान; यत्र—जहाँ; ग्रह—ग्रह; ऋक्ष—तारापुंज; ताराणाम्—तथा तारे; ज्योतिषाम्—नक्षत्रों से; चक्रम्—चक्कर; आहितम्—किया जाता है; मेढ्याम्—केन्द्रीय दण्ड के चारों ओर; गो—बैलों का; चक्र—झुंड; वत्—सद्श; स्थास्नु—स्थिर; परस्तात्—परे; कल्प—ब्रह्मा का एक दिन (कल्प); वासिनाम्—रहेन वालों का; धर्म:—धर्म; अग्नि:— अग्नि; कश्यप:—कश्यप; शुक्र:—शुक्र; मुनय:—मुनिगण; ये—जो सभी; वन-ओकस:—जंगल में रहकर; चरन्ति—चलते हैं; दक्षिणी-कृत्य—अपनी दायीं ओर करके; भ्रमन्त:—प्रदक्षिणा लगाते हुए; यत्—जो ग्रह; सतारका:—समस्त तारों सहित ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ने आगे कहा : हे ध्रुव, मैं तुम्हें ध्रुव नामक देदीप्यमान ग्रह प्रदान करूँगा जो कल्पान्त में प्रलय के बाद भी अस्तित्व में रहेगा। अभी तक उस ग्रह में किसी ने राज्य नहीं किया है; तथा वह समस्त सौर मण्डल, ग्रहों तथा नक्षत्रों से घिरा हुआ है। आकाश में सभी ज्योतिष्क इसी ग्रह की प्रदक्षिणा करते हैं, जिस प्रकार कि अनाज को कूटने के लिए सारे बैल एक केन्द्रीय लट्ठे के चारों ओर चक्कर लगाते हैं। धर्म, अग्नि, कश्यप तथा शुक्र जैसे ऋषियों द्वारा बसाये गये सभी तारे ध्रुवतारे को अपनी दाईं ओर रखकर उसकी परिक्रमा करते हैं, जो अन्यों के विनष्ट हो जाने पर भी इसी प्रकार बना रहता है।
 
तात्पर्य
 यद्यपि ध्रुव महाराज द्वारा अधिकार प्राप्त करने के पूर्व भी ध्रुवतारे का अस्तित्व था, किन्तु उसका कोई अधिष्ठाता देव न था। यह ध्रुवलोक, जो हमारा ध्रुवतारा है, अन्य समस्त तारों तथा सौर मण्डल का केन्द्र है, क्योंकि वे सभी नक्षत्र तथा सौरमण्डल ध्रुवलोक की उसी प्रकार प्रदक्षिणा करते हैं जिस प्रकार बैल अन्न कूटने के लिए एक मध्यवर्ती स्तम्भ के चारों ओर घूमता है। ध्रुव ने सर्वश्रेष्ठ ग्रह (लोक) चाहा था और उनकी यह इच्छा बालकों जैसी थी, फिर भी भगवान् ने उसे पूरी कर दिया। एक छोटा बालक अपने पिता से ऐसी वस्तु माँग सकता है, जो अभी तक उसने किसी को न दी हो, किन्तु तो भी पिता प्रेमवश उसे वह वस्तु दे देता है। इसी प्रकार यह अद्वितीय ध्रुवलोक महाराज ध्रुव को प्राप्त हुआ। इस ग्रह की विशेषता है कि प्रलय हो जाने पर, यहाँ तक कि ब्रह्मा की रात्रि के समय होनेवाले प्रलय में भी, यह बना रहेगा। प्रलय दो प्रकार का होता है—एक तो ब्रह्मा की रात्रि के समय और दूसरा ब्रह्मा के जीवन के अन्त में। ब्रह्मा के जीवन के अन्त समय कुछ चुने हुए पुरुष भगवान् के धाम जाते हैं। ध्रुव महाराज उनमें से एक हैं। भगवान् ने ध्रुव को आश्वस्त किया कि वे आंशिक प्रलय के बाद भी जीवित रहेंगे। इस प्रकार पूर्ण प्रलय होने पर वे सीधे वैकुण्ठलोक चले जाएँगे। इस सन्दर्भ में श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर की टीका है कि ध्रुवलोक श्वेतद्वीप, मथुरा तथा द्वारका जैसा एक लोक है। ये ईश्वर के राज्य के शाश्वत स्थल हैं, जिनका वर्णन भगवद्गीता (तद्धाम् परमम्) तथा वेदों में (ॐ तद् विष्णो: परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरय:) हुआ है। परस्तात् कल्प वासिनाम् शब्दों का अर्थ, “प्रलय के बाद आबाद ग्रहों से परे” है, जो वैकुण्ठलोक का सूचक है। दूसरे शब्दों में, भगवान् ने ध्रुव महाराज को वैकुण्ठलोक भेजने का आश्वासन दे दिया।
 
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