श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 9: ध्रुव महाराज का घर लौटना  »  श्लोक 24

 
श्लोक
इष्ट्वा मां यज्ञहृदयं यज्ञै: पुष्कलदक्षिणै: ।
भुक्त्वा चेहाशिष: सत्या अन्ते मां संस्मरिष्यसि ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
इष्ट्वा—पूजा करके; माम्—मुझको; यज्ञ-हृदयम्—समस्त यज्ञों का हृदय; यज्ञै:—महान् यज्ञों से; पुष्कल-दक्षिणै:—प्रभूत दान वितरित करके; भुक्त्वा—भोग करने के पश्चात्; च—भी; इह—इस संसार में; आशिष:—आशीर्वाद; सत्या:—सच, सही; अन्ते—अन्त में; माम्—मुझको; संस्मरिष्यसि—स्मरण करने में समर्थ होगे ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ने आगे कहा : मैं समस्त यज्ञों का हृदय हूँ। तुम अनेक बड़े-बड़े यज्ञ सम्पन्न करोगे और प्रचुर दान भी दोगे। इस प्रकार तुम इस जीवन में भौतिक सुख के वरदान को भोग सकोगे और अपनी मृत्यु के समय तुम मेरा स्मरण कर सकोगे।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में सबसे महत्त्वपूर्ण बात है भगवान् द्वारा दी गई शिक्षाएँ कि मृत्यु के समय भगवान् का स्मरण किस प्रकार किया जाये। अन्ते नारायण स्मृति:—आध्यात्मिक कार्यों को सम्पन्न करने के लिए हम जो भी करते हैं उसका फल सार्थक होता है, यदि हम भगवान् नारायण का स्मरण कर सकें। निरन्तर स्मरण का यह कार्यक्रम कई कारणों से भंग हो सकता है, किन्तु ध्रुव महाराज का जीवन इतना पवित्र होना था कि वे भगवान् को कभी भूल नहीं सकेंगे। अत: वे मृत्यु के समय परमेश्वर का स्मरण करेंगे और मृत्यु के पूर्व इस भौतिक संसार का सुखोपभोग इन्द्रियतृप्ति द्वारा नहीं, अपितु बड़े-बड़े यज्ञ सम्पन्न करके करेंगे। जैसाकि वेदों में उल्लेख है, जब कोई मनुष्य बड़े-बड़े यज्ञ करता है, तो उसे न केवल ब्राह्मणों को दान देना चाहिए, बल्कि क्षत्रियों,
वैश्यों तथा शूद्रों को भी देना चाहिए। यहाँ यह विश्वास व्यक्त किया गया है कि ध्रुव महाराज ऐसे कार्य करते रहेंगे। किन्तु इस कलियुग में जो सबसे बड़ा यज्ञ किया जा सकता है, वह संकीर्तन यज्ञ है। हमारा कृष्णभावनामृत आन्दोलन लोगों को (तथा हम सबको) भगवान् का सही आदेश सिखाने के लिए चलाया गया है। इस प्रकार हम निरन्तर संकीर्तन यज्ञ करते रहेंगे और हरे कृष्ण मंत्र का जप करते रहेंगे। तब मृत्यु के समय हम अवश्य ही श्रीकृष्ण का स्मरण कर सकेंगे और हमारे जीवन का सारा कार्यक्रम सफल हो सकेगा। इस युग में दान का स्थान प्रसाद-वितरण ने ग्रहण कर लिया है। किसी के पास भी इतना धन नहीं कि उसे बाँट सके, किन्तु यदि हम यथासम्भव कृष्णप्रसाद का वितरण करें तो यह धन-वितरण की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण होगा।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥