श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 9: ध्रुव महाराज का घर लौटना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक
तद्दर्शनेनागतसाध्वस: क्षिता-
ववन्दताङ्गं विनमय्य दण्डवत् ।
द‍ृग्भ्यां प्रपश्यन् प्रपिबन्निवार्भक-
श्चुम्बन्निवास्येन भुजैरिवाश्लिषन् ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
तत्-दर्शनेन—भगवान् का दर्शन करके; आगत-साध्वस:—अत्यधिक विह्वल ध्रुव महाराज; क्षितौ—पृथ्वी पर; अवन्दत— नमस्कार किया; अङ्गम्—शरीर; विनमय्य—गिरकर; दण्डवत्—डंडे के समान; दृग्भ्याम्—अपनी आँखों से; प्रपश्यन्—देखते हुए; प्रपिबन्—पान करते हुए; इव—सदृश; अर्भक:—बालक; चुम्बन्—चुम्बन; इव—सदृश्य; आस्येन—मुख से; भुजै:— अपनी बाहों से; इव—सदृश; आश्लिषन्—भरते हुए ।.
 
अनुवाद
 
 जब ध्रुव महाराज ने अपने भगवान् को अपने सन्मुख देखा तो वे अत्यन्त विह्वल हो उठे और उन्होंने उनका सादर अभिवादन किया। वे उनके समक्ष दण्ड के समान गिर पड़े और भगवत्प्रेम में मग्न हो गये। आनन्द में ध्रुव महाराज भगवान् को इस प्रकार देख रहे थे, मानो उन्हें आँखों से पी रहे हों, उनके चरण कमलों को अपने मुख से चूम रहे हों और उन्हें अपनी भुजाओं में भर रहे हों।
 
तात्पर्य
 स्वाभाविक है कि जब ध्रुव महाराज ने भगवान् को अपने सामने देखा तो वे विस्मय एवं सम्मान के कारण विह्वल हो उठे और ऐसा प्रतीत होने लगा मानो वे उनके सारे स्वरूप को अपनी आँखों से पी जाएँगे। भगवान् के प्रति भक्त का प्रेम इतना उत्कट होता है कि वह उनके चरण कमलों को निरन्तर चूमते रहना चाहता है, वह उनके नखाग्रों का स्पर्श करते रहना चाहता है तथा उनके चरणकमलों को लगातार भुजाओं में भरे रहना चाहता है। भगवान् को अपने समक्ष देखकर ध्रुव महाराज के शरीर में उठनेवाले ये भाव बताते हैं कि उनके शरीर में आठ प्रकार के दिव्य आनन्द प्रकट हो उठे।
 
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