श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 9: ध्रुव महाराज का घर लौटना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक
स तं विवक्षन्तमतद्विदं हरि-
र्ज्ञात्वास्य सर्वस्य च हृद्यवस्थित: ।
कृताञ्जलिं ब्रह्ममयेन कम्बुना
पस्पर्श बालं कृपया कपोले ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
स:—भगवान्; तम्—ध्रुव महाराज को; विवक्षन्तम्—गुणों का गान करने की अभिलाषा से; अ-तत्-विदम्—उसमें पटु न होने से; हरि:—भगवान्; ज्ञात्वा—जानकर; अस्य—ध्रुव का; सर्वस्य—प्रत्येक का; च—तथा; हृदि—हृदय में; अवस्थित:—स्थित होकर; कृत-अञ्जलिम्—हाथ जोड़ कर; ब्रह्म-मयेन—वैदिक मंत्रों के शब्दों से युक्त; कम्बुना—अपने शंख से; पस्पर्श—स्पर्श किया; बालम्—बालक को; कृपया—अहैतुकी कृपा से; कपोले—मस्तक पर ।.
 
अनुवाद
 
 यद्यपि ध्रुव महाराज छोटे से बालक थे, किन्तु वे उपयुक्त शब्दों से भगवान् की स्तुति करना चाह रहे थे। किन्तु अनुभवहीन होने के कारण वे तुरन्त अपने को सँभाल नहीं सके। प्रत्येक हृदय में वास करनेवाले भगवान् ध्रुव महाराज की विषम स्थिति को समझ गये। अत: अपनी अहैतुकी कृपा से उन्होंने अपने समक्ष हाथ जोडक़र खड़े हुए ध्रुव महाराज के मस्तक पर अपना शंख छुआ दिया।
 
तात्पर्य
 प्रत्येक भक्त भगवान् के दिव्य गुणों का गान करना चाहता है। भक्त सदैव भगवान् के दिव्य गुणों को सुनने के लिए इच्छुक रहते हैं और इन गुणों का गान करना चाहते रहते हैं, किन्तु कभी-कभी विनम्रतावश कठिनाई उपस्थित हो जाती है। अत: प्रत्येक मनुष्य के हृदय में वास करनेवाले भगवान् अपने भक्त को बुद्धि प्रदान करते हैं कि वह यशगान कर सके। अत: यह मानना चाहिए कि भक्त जब भगवान् के विषय में कुछ लिखता या बोलता है, तो उसके शब्द भगवान् द्वारा उसके अन्त:करण से प्रस्कुटित किये हुए होते हैं। इसकी पुष्टि भगवद्गीता के दशम अध्याय में इस प्रकार हुई है—जो लोग ईश्वर की दिव्य सेवा में निरन्तर लगे रहते हैं, उन्हें भगवान् उनके अन्त:करण से आदेश देते रहते हैं कि उनके सेवा के लिए आगे क्या किया जाये। ध्रुव महाराज को अनुभव न होने के कारण जब जब भगवान् का वर्णन न कर सकने के कारण संकोच हुआ, तो भगवान् ने अपनी अहैतुकी कृपावश उनके मस्तक पर अपना शंख छुआ दिया जिससे ध्रुव को दिव्य प्रेरणा प्राप्त हो गई। यह दिव्य प्रेरणा ब्रह्म-मय कहलाती है, क्योंकि जब कोई इस प्रकार से प्रेरित होता है, तो उसके मुख से जो ध्वनि निकलती है, वह ठीक वेदों की ध्वनि जैसी होती है। यह ध्वनि इस भौतिक जगत की सामान्य ध्वनि नहीं होती। अत: हरे कृष्ण मंत्र की ध्वनि को भले ही वह सामान्य शब्दों में प्रस्तुत की जाती है, सांसारिक अथवा भौतिक नहीं समझना चाहिए।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥