श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 9: ध्रुव महाराज का घर लौटना  »  श्लोक 6

 
श्लोक
ध्रुव उवाच
योऽन्त: प्रविश्य मम वाचमिमां प्रसुप्तां
सञ्जीवयत्यखिलशक्तिधर: स्वधाम्ना ।
अन्यांश्च हस्तचरणश्रवणत्वगादीन्
प्राणान्नमो भगवते पुरुषाय तुभ्यम् ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
ध्रुव: उवाच—ध्रुव महाराज ने कहा; य:—जो परमेश्वर; अन्त:—अन्त:करण; प्रविश्य—प्रवेश करके; मम—मेरे; वाचम्— शब्द; इमाम्—ये सभी; प्रसुप्ताम्—निश्चल या मृत; सञ्जीवयति—पुन: जीवित होता है; अखिल—विश्वव्यापी; शक्ति—शक्ति; धर:—धारण करनेवाला; स्व-धाम्ना—अपनी अन्तरंगा शक्ति से; अन्यान् च—अन्य अंग भी; हस्त—यथा हाथ; चरण—पाँव; श्रवण—कान; त्वक्—चर्म; आदीन्—इत्यादि; प्राणान्—प्राण, जीवन-शक्ति; नम:—नमस्कार है; भगवते—भगवान् को; पुरुषाय—परम पुरुष को; तुभ्यम्—तुमको ।.
 
अनुवाद
 
 ध्रुव महाराज ने कहा : हे भगवन्, आप सर्वशक्तिमान हैं। मेरे अन्त:करण में प्रविष्ट होकर आपने मेरी सभी सोई हुई इन्द्रियों को—हाथों, पाँवों, स्पर्शेन्द्रिय, प्राण तथा मेरी वाणी को— जाग्रत कर दिया है। मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।
 
तात्पर्य
 ध्रुव महाराज सहज ही अनुमान लगा सके कि आत्म-साक्षात्कार करने और साक्षात् भगवान् को देखने के पूर्व और पश्चात् उनकी जो स्थिति थी उसमें कितना अन्तर था। उन्हें अनुभव हुआ कि उनके प्राण तथा कार्य सुप्तावस्था में थे। जब तक मनुष्य आध्यात्मिक स्तर पर नहीं पहुंचता, उसके शरीर के अंग, उसका मन तथा अन्य अनुभव सोए हुए समझे जाते हैं। जब तक मनुष्य आध्यात्मिक, स्तर पर नहीं पहुंचता, उसके शरीर के अंग, उसका मन तथा अन्य अवयव सोए हुए समझे जाते हैं। जब तक मनुष्य आत्म-दशा को प्राप्त नहीं होता, तब तक उसके सारे कार्य मृत व्यक्ति के कार्य या प्रेत कार्य समझे जाते हैं। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने अपने एक गीत में स्वयं को इस प्रकार सम्बोधित किया है, “हे जीवात्मा! जागो! तुम माया की गोद में कब तक सोते रहोगे? अब तुम्हें मानव देह प्राप्त हुई है, अत: तुम जगने और अपने को समझने का प्रयत्न करो।” वेद भी यही घोषित करते हैं, “उठो, उठो, तुम्हें मनुष्य रूप का वरदान प्राप्त हुआ है, अत: अपने आपको पहचानो। ” ये वैदिक आदेश हैं।
ध्रुव महाराज को वास्तविक अनुभव हुआ कि इन्द्रियों के आध्यात्मिक स्तर पर आलोकित होने से वे वैदिक आदेश के सार को—कि परमेश्वर ही परम पुरुष है, वह निर्गुण नहीं है—समझ सके। उन्हें तुरन्त ही यह बात समझ में आ गई। उन्हें इसका ज्ञान था कि दीर्घकाल से वे सुप्तप्राय थे और अब वैदिक ज्ञान के अनुसार भगवान् की स्तुति करने के लिए प्रोत्साहन प्राप्त कर सके हैं। कोई सांसारिक व्यक्ति भगवान् की स्तुति या यशोगान नहीं कर सकता क्योंकि उसे वैदिक सार का अनुभव नहीं होता। अत: जब ध्रुव महाराज ने अपने आपमें अन्तर देखा तो वे तुरन्त समझ गये कि यह भगवान् की अहैतुकी कृपा से हो रहा है। उन्होंने अत्यन्त श्रद्धा तथा सम्मानपूर्वक भगवान् को नमस्कार किया और समझ गये कि उन पर भगवान् की पूर्ण कृपा है। ध्रुव महाराज की इन्द्रियों तथा मन का यह आत्म- जागरण भगवान् की अन्तरंगा शक्ति के प्रभाव से था। अत: इस श्लोक में स्व-धाम्ना शब्द का अर्थ है, “परा शक्ति द्वारा।” भगवान् की पराशक्ति की कृपा से ही आत्म प्रकाश सम्भव है। हरे कृष्ण मंत्र कीर्तन में सर्वप्रथम भगवान् की पराशक्ति की कृपा, हरे, को सम्बोधित किया गया है। जब जीवात्मा पूर्ण रूप से आत्मसमर्पण कर देता है और सनातन दास के रूप में अपने को स्वीकार कर लेता है, तब पराशक्ति कार्य करती है। जब कोई मनुष्य परमेश्वर के कहने या उनके आदेश पालन के लिए तत्पर रहता है, तो वह सेवोन्मुख कहलाता है। उस समय पराशक्ति ही उसे भगवान् के भेद को प्रकट करती है।

पराशक्ति द्वारा प्रकट किये बिना कोई भगवान् की स्तुति कर सकने में समर्थ नहीं है। चाहे संसारी जीव कितना ही दार्शनिक चिन्तन अथवा काव्यसृजन क्यों न करे, फिर भी यह भौतिक शक्ति की क्रिया-प्रतिक्रिया माना जाता है। जब कोई पराशक्ति द्वारा सचमुच जाग्रत होता है, तो उसकी सारी इन्द्रियाँ शुद्ध हो जाती हैं और वह केवल भगवान् की सेवा करता है। उस समय उसकी सारी इन्द्रियाँ—

हाथ, पाँव, कान, जीभ, मन, जननांग आदि—भगवान् की सेवा में लग जाती हैं। ऐसे प्रकाश-प्राप्त भक्त के न तो कोई भौतिक कार्य रह जाते हैं और न उसे सांसारिक कामों में व्यस्त रहना रुचिकर प्रतीत होता है। इन्द्रियों को शुद्ध करने उन्हें भगवान् की सेवा में लगाने की यह प्रक्रिया भक्ति कहलाती है। प्रारम्भ में तो गुरु तथा शास्त्र के निर्देशन से इन्द्रियों को सेवा में लगाया जाता है, किन्तु साक्षात्कार के बाद वही इन्द्रियाँ शुद्ध हो जाती हैं और सेवा-भाव चलता रहता है। अन्तर इतना ही होता है कि प्रारम्भ में इन्द्रियाँ यांत्रिक रूप से तत्पर होती हैं, किन्तु साक्षात्कार के बाद वे आत्म-ज्ञान द्वारा सेवा में लग जाती हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥