श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 9: ध्रुव महाराज का घर लौटना  »  श्लोक 9

 
श्लोक
नूनं विमुष्टमतयस्तव मायया ते
ये त्वां भवाप्ययविमोक्षणमन्यहेतो: ।
अर्चन्ति कल्पकतरुं कुणपोपभोग्य-
मिच्छन्ति यत्स्पर्शजं निरयेऽपि नृणाम् ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
नूनम्—अवश्य ही; विमुष्ट-मतय:—जिन्होंने अपनी बुद्धि खो दी है; तव—तुम्हारी; मायया—माया के प्रभाव से; ते—वे; ये— जो; त्वाम्—तुम; भव—जन्म से; अप्यय—तथा मृत्यु; विमोक्षणम्—मुक्ति का कारण; अन्य-हेतो:—अन्य कार्यों के लिए; अर्चन्ति—पूजते हैं; कल्पक-तरुम्—जो कल्पतरु के समान हैं; कुणप—इस मृत शरीर का; उपभोग्यम्—इन्द्रियतृप्ति; इच्छन्ति—इच्छा करते हैं; यत्—जो; स्पर्श-जम्—स्पर्श से उत्पन्न; निरये—नरक में; अपि—भी; नृणाम्—मनुष्यों के लिए ।.
 
अनुवाद
 
 जो व्यक्ति इस चमड़े के थैले (शवतुल्य देह) की इन्द्रियतृप्ति के लिए ही आपकी पूजा करते हैं, वे निश्चय ही आपकी माया द्वारा प्रभावित हैं। आप जैसे कल्पवृक्ष तथा जन्म-मृत्यु से मुक्ति के कारण को पार करके भी मेरे समान मूर्ख व्यक्ति आपसे इन्द्रियतृप्ति हेतु वरदान चाहते हैं, जो नरक में रहनेवाले व्यक्तियों के लिए भी उपलब्ध हैं।
 
तात्पर्य
 ध्रुव महाराज को पश्चात्ताप हो रहा था क्योंकि वे भौतिक लाभ के उद्देश्य से भगवान् की भक्ति में प्रवृत्त हुए थे। यहाँ पर वे अपनी इस प्रवृत्ति की भर्त्सना करते हैं। केवल अज्ञानवश ही मनुष्य इन्द्रियतृप्ति या भौतिक लाभ के उद्देश्य से भगवान् की पूजा करता है। भगवान् तो कल्पवृक्ष के सदृश हैं। चाहे जो कुछ भी
उनसे लिया जा सकता है; किन्तु सामान्यत: लोग यह नहीं जानते हैं कि उनसे किस प्रकार का वरदान प्राप्त किया जाये। स्पर्श-सुख या काम-सुख तो कूकर-सूकर के जीवन में भी पाया जाता है। ऐसा सुख अत्यन्त तुच्छ होता है। यदि कोई भक्त ऐसे तुच्छ सुख के लिए भगवान् की पूजा करता है, तो समझना चाहिए कि वह समस्त ज्ञान से शून्य है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥