श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 1: महाराज प्रियव्रत का चरित्र  »  श्लोक 11

 
श्लोक
श्रीभगवानुवाच
निबोध तातेदमृतं ब्रवीमि
मासूयितुं देवमर्हस्यप्रमेयम् ।
वयं भवस्ते तत एष महर्षि-
र्वहाम सर्वे विवशा यस्य दिष्टम् ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-भगवान् उवाच—परम पुरुष ब्रह्मा ने कहा; निबोध—ध्यानपूर्वक सुनो; तात—मेरे प्रिय पुत्र; इदम्—यह; ऋतम्—सत्य; ब्रवीमि—बोल रहा हूँ; मा—मत; असूयितुम्—ईर्ष्यालु; देवम्—भगवान्; अर्हसि—तुम्हें चाहिए; अप्रमेयम्—जो हमारे प्रयोगात्मक ज्ञान से परे है; वयम्—हम; भव:—शिवजी; ते—तुम्हारा; तत:—पिता; एष:—यह; महा-ऋषि:—नारद; वहाम:—पालन करते हैं; सर्वे—सभी; विवशा:—विचलित होने में अशक्त; यस्य—जिसकी; दिष्टम्—आज्ञा ।.
 
अनुवाद
 
 इस ब्रह्माण्ड के परम पुरुष भगवान् ब्रह्मा ने कहा—हे प्रियव्रत, मैं जो कुछ कहूँ उसे ध्यान से सुनो। परमेश्वर से ईर्ष्या न करो क्योंकि वे हमारे प्रयोगात्मक परिमापों से परे हैं। हम सबों को, जिसमें शिवजी, तुम्हारे पिता तथा महर्षि नारद भी सम्मिलित हैं, परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना पड़ता है। हम उनकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकते।
 
तात्पर्य
 बारह भक्त महाजनों में से चार—स्वयं ब्रह्मा, उनके पुत्र नारद, स्वायंभुव मनु तथा शिवजी—प्रियव्रत के सम्मुख उपस्थित थे। उनके साथ अनेक अधिकृत साधुजन भी थे। ब्रह्माजी प्रियव्रत को सर्वप्रथम यह बताना चाहते थे कि यद्यपि ये सभी महापुरुष अधिकारी हैं, किन्तु वे इस श्लोक में वर्णित देव अर्थात् सदैव कीर्तिमय भगवान् की आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकते। भगवान् की शक्ति, कीर्ति तथा शौर्य कभी न घटने वाले हैं। ईशोपनिषद् में ईश्वर को अपापविद्ध कहा गया है, जिससे यह सूचित होता है कि वे भौतिक पापों से कभी प्रभावित नहीं होते। श्रीमद्भागवत में भी वर्णित किया गया है कि भगवान् इतने शक्तिशाली हैं कि उन पर हमारे विचार में समझे जानेवाला कोई भी कुत्सित कृत्य असर नहीं कर सकता है। परमेश्वर के पद की व्याख्या करने के लिए कभी-कभी सूर्य का उदाहरण दिया जाता है, जो मिट्टी में से मूत्र को उड़ा देता है, किन्तु स्वयं कलुषित नहीं होता। भगवान् पर यह दोषारोपण नहीं किया जा सकता कि वे कोई गलत काम करते हैं।
ब्रह्माजी प्रियव्रत को ब्रह्माण्ड के शासन का भार स्वीकार करने के लिए प्रेरित करने गये, तो वे किसी सनकवश नहीं गये। वे तो भगवान् की आज्ञा का ही पालन कर रहे थे। दरअसल, ब्रह्मा तथा अन्य प्रमाणित अधिकारी उन भगवान् की आज्ञा के बिना कुछ भी नहीं करते, जो प्रत्येक प्राणी के हृदय में विराजमान हैं। श्रीमद्भागवत के प्रारम्भ में कहा गया है—तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये—ईश्वर ने ब्रह्मा को उनके हृदय के भीतर से वैदिक ज्ञान की शिक्षा दी। जीवात्मा भक्ति से जितना ही पवित्र होता जाता है, वह भगवान् के उतने ही निकट सम्पर्क में आता है, जैसाकि श्रीमद्भगवद्गीता (१०.१०) में पुष्टि की गई है—

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।

ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥

“जो मेरी सतत भक्ति से और प्रीतिपूर्वक पूजा करते हैं, उन्हें मैं बुद्धि प्रदान करता हूँ, जिससे वे मेरे पास आ सकें।” अत: ब्रह्माजी अपनी सनक से प्रियव्रत के पास नहीं आये थे अपितु यही समझना चाहिए कि भगवान् ने उन्हें प्रियव्रत को मनाने की आज्ञा दी थी। चूँकि उन्हें भौतिक इन्द्रियों के द्वारा नहीं जाना जा सकता इसीलिए उन्हें यहाँ अप्रमेय कहा गया है। इसीलिए भगवान् ब्रह्मा ने प्रियव्रत को पहले यह समझाया कि वे उनके शब्दों को ध्यानपूर्वक और ईष्यारहित होकर सुनें।

यहाँ पर संकेत दिया गया है कि अन्य कुछ कार्य करना चाहते हुए भी मनुष्य को कुछ विशिष्ट कार्य क्यों करने पड़ते हैं। कोई भी प्राणी, चाहे वह शिवजी, ब्रह्माजी, मनु या महर्षि नारद के समान शक्तिशाली क्यों न हो, परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकता। ये सभी महाजन निश्चय ही अत्यन्त शक्तिमान हैं, किन्तु उनमें भगवान् की आज्ञा का उल्लंघन करने की तनिक भी शक्ति नहीं है। चूँकि ब्रह्माजी भगवान् की आज्ञानुसार प्रियव्रत के पास आये थे, अत: सर्वप्रथम उन्होंने प्रियव्रत के मन से इस भ्रान्ति को दूर करना चाहा कि वे उसके शत्रु जैसा कार्य कर रहे हैं। ब्रह्माजी परमेश्वर की आज्ञा का पालन कर रहे थे अतएव प्रियव्रत को ब्रह्माजी के आदेश को जो भगवान् की इच्छा के अनुसार था, स्वीकार करना श्रेयस्कर था।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥