श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 1: महाराज प्रियव्रत का चरित्र  »  श्लोक 20

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
इति समभिहितो महाभागवतो भगवतस्त्रिभुवनगुरोरनुशासनमात्मनो लघुतयावनतशिरोधरो बाढमिति सबहुमानमुवाह ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति—इस प्रकार; समभिहित:—पूर्णतया उपदिष्ट; महा-भागवत:—परम भक्त; भगवत:—अति शक्तिमान ब्रह्माजी का; त्रि-भुवन—तीनों लोकों के; गुरो:—गुरु की; अनुशासनम्—आज्ञा, आदेश; आत्मन:—स्वयं का; लघुतया—लघुता के कारण; अवनत—झुका हुआ; शिरोधर:—उसका शिर; बाढम्—जो आज्ञा; इति— इस प्रकार; स-बहु-मानम्—अत्यन्त आदर समेत; उवाह—पालन किया ।.
 
अनुवाद
 
 श्रीशुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा—इस प्रकार तीनों लोकों के गुरु ब्रह्माजी द्वारा भलीभाँति उपदेश दिये जाने पर अपना पद छोटा होने के कारण प्रियव्रत ने नमस्कार करते हुए उनका आदेश शिरोधार्य किया और अत्यन्त आदरपूर्वक उसका पालन किया।
 
तात्पर्य
 श्री प्रियव्रत ब्रह्माजी के पौत्र थे, अत: सामाजिक शिष्टाचार के नाते उनका पद छोटा था और छोटों का यह धर्म है कि वे अपने गुरुजनों के आदेश का पालन करें। इसीलिए प्रियव्रत ने तुरन्त कहा, “जो आज्ञा मै आपके आदेश का पालन करुँगा।” प्रियव्रत को महाभागवत अर्थात् महान् भक्त कहा गया है। महान्
भक्त का यह कर्तव्य है कि वह अपने गुरु अथवा गुरु के भी गुरु की आज्ञा का परम्परानुसार पालन करे। जैसाकि भगवद्गीता (४.२) में कथित है—एवं परम्परा प्राप्तम्—मनुष्य को गुरु परम्परा से भगवान् के आदेश प्राप्त करने होते हैं। भगवान् का भक्त अपने को भगवान् के दासों का भी दास मानता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥