श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 1: महाराज प्रियव्रत का चरित्र  »  श्लोक 29

 
श्लोक
एवमुपशमायनेषु स्वतनयेष्वथ जगतीपतिर्जगतीमर्बुदान्येकादश परिवत्सराणामव्याहताखिलपुरुषकारसारसम्भृतदोर्दण्डयुगलापीडितमौर्वीगुणस्तनितविरमितधर्मप्रतिपक्षो बर्हिष्मत्याश्चानुदिनमेधमानप्रमोदप्रसरणयौषिण्यव्रीडाप्रमुषितहासावलोकरुचिरक्ष्वेल्यादिभि: पराभूयमानविवेक इवानवबुध्यमान इव महामना बुभुजे ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; उपशम-अयनेषु—सभी सुयोग्य; स्व-तनयेषु—अपने पुत्रों में से; अथ—तत्पश्चात्; जगती-पति:—ब्रह्माण्ड के स्वामी; जगतीम्—ब्रह्माण्ड को; अर्बुदानि—अर्बुद (१०,००,००,००० की संख्या); एकादश—ग्यारह; परिवत्सराणाम्— वर्षों का; अव्याहत—बिना रोकटोक के; अखिल—विश्वव्यापी; पुरुष-कार—शौर्य; सार—शक्ति; सम्भृत—प्रदत्त; दो: दण्ड:—बलिष्ठ भुजाओं वाले; युगल—दो; आपीडित—खींची गई; मौर्वी-गुण—धनुष की डोरी; स्तनित—टंकार से; विरमित—पराजित; धर्म—धार्मिक नियम; प्रतिपक्ष:—विपक्षी; बर्हिष्मत्या:—अपनी पत्नी बर्हिष्मती का; च—तथा; अनुदिनम्—प्रतिदिन; एधमान—वर्धमान; प्रमोद—मनोरंजन; प्रसरण—सुशीलता, सौजन्य; यौषिण्य—स्त्रियोचित व्यवहार; व्रीडा—लज्जा से; प्रमुषित—संकुचित; हास—हँसी, हास्य; अवलोक—चितवन; रुचिर—मनोहर; क्ष्वेलि-आदिभि:—विनोद इत्यादि; पराभूयमान—पराजित होकर; विवेक:—अपने वास्तविक ज्ञान; इव—सदृश; अनवबुध्यमान:—विवेकहीन व्यक्ति; इव—सदृश; महा-मना:—महान् आत्मा; बुभुजे—राज्य किया, भोगा ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार से कवि, महावीर तथा सवन के परमहंस अवस्था में भलीभाँति प्रशिक्षित हो जाने पर महाराज प्रियव्रत ने ग्यारह अर्बुद वर्षों तक ब्रह्माण्ड पर शासन किया। जिस समय वे अपनी बलशाली भुजाओं से धनुष की डोरी खींच कर तीर चढ़ा लेते थे उस समय धार्मिक जीवन के नियमों को न मानने वाले उनके विपक्षी विश्वपर शासन करने के उनके अद्वितीय शौर्य से डर कर न जाने कहाँ भाग जाते थे। वे अपनी पत्नी बर्हिष्मती को अगाध प्यार करते थे और समय बीतने के साथ ही उनका प्रणय भी बढ़ता गया। अपनी स्त्रियोचित वेशभूषा, उठने-बैठने, हँसी तथा चितवन से महारानी बर्हिष्मती उन्हें शक्ति प्रदान करती थी। इस प्रकार महात्मा होते हुए भी वे अपनी पत्नी के स्त्री-उचित व्यवहार में खो गये। वे उसके साथ सामान्य पुरुष-सा आचरण करते, किन्तु वे वास्तव में महान् आत्मा थे।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में धर्म-प्रतिपक्ष: धार्मिक सिद्धान्तों के विरोधी से किसी विशेष धर्म का नहीं वरन् वर्णाश्रम धर्म का संकेत मिलता है। सामाजिक व्यवस्था बनाये रखने एवं नागरिकों को जीवन लक्ष्य अर्थात् आध्यात्मिक ज्ञान की ओर क्रमश: अग्रसर होने के लिए आवश्यक है कि वर्णाश्रम धर्म के नियमों का पालन किया जाये। इस श्लोक से प्रतीत होता है कि वर्णाश्रम धर्म के पालन में महाराज प्रियव्रत इतने कठोर थे कि इसकी उपेक्षा करने वाले युद्ध के लिए ललकारे जाने या दंडित किये जाने की चेतावनी पर राजा से दूर भागते फिरते थे। दरअसल महाराज प्रियव्रत को अपने दृढ़ संकल्प के कारण लडऩे की आवश्यकता नहीं पड़ी; उनके विपक्षी वर्णाश्रम धर्म के नियमों का उल्लंघन करने का दुस्साहस नहीं कर सकते थे। कहा गया है जो मानव समाज वर्णाश्रम धर्म द्वारा चालित नहीं है, वह बिल्लियों तथा कुत्तों के पशु-समाज से बढक़र नहीं है। अत: महाराज प्रियव्रत ने अपने असाधारण तथा अद्वितीय शौर्य से वर्णाश्रम धर्म को दृढ़ बनाये रखा।
इस प्रकार का कठोर जागरूक जीवन बनाये रखने के लिए मनुष्य को अपनी पत्नी से प्रोत्साहन की आवश्यकता पड़ती है। वर्णाश्रम धर्म प्रणाली में, ब्राह्मण तथा संन्यासियों को स्त्रियों से किसी प्रकार के प्रोत्साहन की आवश्यकता नहीं होती। किन्तु क्षत्रियों तथा गृहस्थों को अपने कर्तव्य-पालन के लिए अपनी पत्नियों से प्रोत्साहन लेने की आवश्यकता रहती है। वास्तविकता तो यह है कि कोई गृहस्थ या क्षत्रिय अपनी पत्नी के सहयोग के बिना अपना दायित्व अच्छी तरह से निभा ही नहीं सकता। श्री चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं यह स्वीकार किया था कि गृहस्थ को अपनी पत्नी के साथ रहना चाहिए। क्षत्रियों को राज-काज चलाने में प्रोस्ताहित किए जाने के लिए कई पत्नियाँ रखने की छूट थी। कर्म तथा राजनैतिक कार्य के जीवन में योग्य पत्नी का साहचर्य अनिवार्य है। अत: सुचारु रूप से कर्तव्य पालने के लिए महाराज प्रियव्रत ने अपनी सुन्दर पत्नी बर्हिष्मती का लाभ उठाया, क्योंकि वह स्त्रियोचित वेशभूषा, मुस्कान तथा अपने नारी सुलभ शारीरिक हाव-भावों से अपने महान् पति को प्रसन्न रखने में दक्ष थी। वह महाराज प्रियव्रत को प्रोत्साहित करती रहती जिससे वे उचित रीति से शासन करते थे। इस श्लोक में इव शब्द का दो बार प्रयोग यह बताने के लिए किया गया है कि महाराज प्रियव्रत स्त्री-दास के रूप में आचरण करते हुए ऐसे प्रतीत होते थे जैसे कि वे मानवोचित विवेक खो बैठे हों। किन्तु वास्तव में वे अपने महात्मा पद के प्रति भिज्ञ थे, यद्यपि ऊपर से वे कर्मी पति का-सा आचरण कर रहे थे। इसप्रकार महाराज प्रियव्रत ने ग्यारह अर्बुद वर्षों तक राज्य किया। एक अर्बुद दस करोड़ (१०,००,००,०००) वर्ष के तुल्य होता है।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥