श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 1: महाराज प्रियव्रत का चरित्र  »  श्लोक 40

 
श्लोक
भूसंस्थानं कृतं येन सरिद्ग‍िरिवनादिभि: ।
सीमा च भूतनिर्वृत्यै द्वीपे द्वीपे विभागश: ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
भू-संस्थानम्—पृथ्वी की स्थिति; कृतम्—बनी; येन—जिसके द्वारा; सरित्—नदियों से; गिरि—पर्वतों से; वन-आदिभि:—वन आदि से; सीमा—सीमा रेखाएँ; च—भी; भूत—विभिन्न राष्ट्रों का; निर्वृत्यै—लड़ाई रोकने के लिए; द्वीपे द्वीपे—विभिन्न द्वीपों में; विभागश:—पृथक्-पृथक् ।.
 
अनुवाद
 
 “विभिन्न लोगों में पारस्परिक झगड़ों को रोकने के लिए महाराज प्रियव्रत ने नदियों, पर्वतों के किनारों तथा वनों के द्वारा राज्यों की सीमाएँ निर्धारित कीं, जिससे कोई एक दूसरे की सम्पत्ति में घुस न सके।”
 
तात्पर्य
 महाराज प्रियव्रत ने विभिन्न राज्यों की सीमाएँ अंकित करने का जो उदाहरण प्रस्तुत किया, वह आज भी पाला जाता है। जैसाकि यहाँ इंगित किया गया है, विभिन्न जातियों के लोग विभिन्न भागों में रहते हैं, अत: उन भागों की, जिन्हें यहाँ द्वीप कहा गया है, सीमाएँ विभिन्न नदियों, वनों तथा पर्वतों द्वारा सुनिश्चित कर दी जानी चाहिए। महाराज पृथु के सम्बन्ध में भी ऐसा ही कहा गया है। वे महामुनियों की योजनाओं से अपने पिता के मृत शरीर से उत्पन्न हुए थे। महाराज पृथु का पिता अत्यन्त पापी था। इसलिए उसके मृत शरीर से सर्वप्रथम निषाद नामक एक श्याम पुरुष उत्पन्न हुआ। निषाद जाति को वन में रहने के लिए स्थान मिला, क्योंकि वे जन्म से चोर तथा उचक्के होते हैं। जिस प्रकार पशुओं को विभिन्न जंगलों तथा पहाडिय़ों में
रखा जाता है उसी प्रकार से जो भी मनुष्य पशु की भाँति होते हैं उन्हें भी वहीं रहना होता है। जब तक कृष्णभावना नहीं जगती, कोई भी मनुष्य सभ्य जीवन नहीं बिता सकता, क्योंकि वह अपने कर्म तथा प्रकृतिक गुणों के प्रभाव के कारण किसी विशेष अवस्था में रहने के लिए बाध्य है। यदि मनुष्य मेल-मिलाप तथा शांति से रहना चाहते हैं, तो उन्हें कृष्णभावनामृत ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि देहात्मबुद्धि से वे उच्चतम मानदण्ड को कभी भी नहीं प्राप्त हो सकते। महाराज प्रियव्रत ने इस भूमण्डल को अनेक द्वीपों में इसलिए विभाजित कर दिया जिससे प्रत्येक वर्ग के लोग शान्तिपूर्वक रह सकें और एक दूसरे से तकरार न हो। राष्ट्रवाद की आधुनिक संकल्पना महाराज प्रियव्रत द्वारा किये गये विभागों से ही धीरे-धीरे विकसित हुई है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥