श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 10: जड़ भरत तथा महाराज रहूगण की वार्ता  »  श्लोक 12

 
श्लोक
विशेषबुद्धेर्विवरं मनाक् च
पश्याम यन्न व्यवहारतोऽन्यत् ।
क ईश्वरस्तत्र किमीशितव्यं
तथापि राजन् करवाम किं ते ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
विशेष-बुद्धे:—स्वामी तथा सेवक के भेद की बुद्धि का; विवरम्—क्षेत्र, प्रसार; मनाक्—किंचित; च—भी; पश्याम:—मैं देखता हूँ; यत्—जो; न—नहीं; व्यवहारत:—व्यवहार के सिवा; अन्यत्—अन्य; क:—कौन; ईश्वर:—स्वामी; तत्र—इसमें; किम्—कौन; ईशितव्यम्—वश में किया जाये; तथापि—तो भी; राजन्—हे राजा; करवाम—मैं करूँ; किम्—क्या; ते— तुम्हारे लिए ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजन्, यदि आप अब भी यह सोचते हैं कि आप राजा हैं और मैं आपका दास, तो आप आज्ञा दें और मुझे आपकी आज्ञा का पालन करना होगा। तो मैं यह कह सकता हूँ कि यह अन्तर क्षणिक है और व्यवहार या परम्परावश प्राप्त होता है। मुझे इसका अन्य कारण नहीं दिखाई पड़ता। उस दशा में कौन स्वामी है और कौन दास? प्रत्येक प्राणी प्रकृति के नियमों द्वारा प्रेरित होता है। अत: न तो कोई स्वामी है, न कोई दास। इतने पर भी यदि आप सोचते हैं कि मैं आपका दास हूँ और आप मेरे स्वामी हैं, तो मैं इसे स्वीकार कर लूँगा। कृपया आज्ञा दें। मैं आपकी क्या सेवा करूँ?
 
तात्पर्य
 श्रीमद्भागवत में कहा गया है—अहं मामेति—“मैं यह शरीर हूँ और इस शारीरिक सम्बन्ध से ही वह मेरा स्वामी है, मेरा दास है, मेरी पत्नी है या मेरा पुत्र है।” ये सारे भाव शरीर के अनिवार्य परिवर्तन तथा प्रकृति की व्यवस्था के कारण अस्थिर हैं। हम समुद्र की तरंगों में तिरने वाले तिनकों के समान एकत्र हुए हैं, किन्तु सारे तिनके लहरों के नियमों के द्वारा अवश्य एक दूसरे से पृथक् होंगे। इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति संसार-सागर की लहरों में उतरा रहा है। भक्ति विनोद ठाकुर ने ठीक ही कहा है—
(मिछे) मायार वशे, याच्छ भेसे’।

खाच्छा हाबुडुबु, भाइ ॥

(जीव) कृष्ण-दास, ए विश्वास,।

कर्ले त’आर दु:ख नाइ ॥

“सभी स्त्री तथा पुरुष प्रकृति की तरंगों में तिनकों के समान तैर रहे हैं। यदि वे समझ लें कि वे श्रीकृष्ण के शाश्वत सेवक हैं, तो उनका तैरना बन्द हो जाये।” जैसाकि भगवद्गीता (३.३७) में कहा गया है—काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव:। रजोगुण के कारण हमें अनेक वस्तुओं की इच्छा होती है और हमारी इच्छा या चिन्ता तथा परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार प्रकृति कोई एक शरीर प्रदान करती है। कुछ काल तक हम पात्रों की भाँति रंगमंच में किसी अन्य के नियंत्रण में स्वामी या सेवक की तरह कार्य (अभिनय) करते हैं। हमें चाहिए कि मनुष्य के रूप में इस प्रकार का अभिनय करना बन्द कर दें। हमें चाहिए कि हम अपनी मूल स्वाभाविक स्थिति, कृष्णभावनामृत को प्राप्त करें। इस समय हमारा वास्तविक स्वामी तो प्रकृति है। दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया (भगवद्गीता ७.१४)। प्रकृति के सम्मोहन से हम सेवक तथा स्वामी बन रहे हैं, किन्तु यदि हम श्रीभगवान् तथा उनके शाश्वत सेवकों द्वारा अनुशासित होना स्वीकार कर लें तो यह क्षणिक अवस्था समाप्त हो जाये।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥