श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 10: जड़ भरत तथा महाराज रहूगण की वार्ता  »  श्लोक 13

 
श्लोक
उन्मत्तमत्तजडवत्स्वसंस्थां
गतस्य मे वीर चिकित्सितेन ।
अर्थ: कियान् भवता शिक्षितेन
स्तब्धप्रमत्तस्य च पिष्टपेष: ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
उन्मत्त—पागलपन; मत्त—शराबी; जड-वत्—जड़ की भाँति; स्व-संस्थाम्—मेरी मूल स्वाभाविक स्थिति; गतस्य—प्राप्त किया हुआ; मे—मुझको; वीर—हे राजा; चिकित्सितेन—अपनी भर्त्सना से; अर्थ:—प्रयोजन; कियान्—कौन सा; भवता— आपके द्वारा; शिक्षितेन—शिक्षा दिये गए; स्तब्ध—जड़; प्रमत्तस्य—पागल मनुष्य का; च—भी; पिष्ट-पेष:—आटा पीसने जैसा ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजन्, आपने कहा “रे दुष्ट, जड़ तथा पागल! मैं तुम्हारी चिकित्सा करने जा रहा हूँ और तब तुम होश में आ जाओगे।” इस सम्बन्ध में मुझे कहना है कि यद्यपि मैं जड़, गूँगे तथा बहरे मनुष्य की भाँति रहता हूँ, किन्तु मैं सचमुच एक स्वरूप-सिद्ध व्यक्ति हूँ। आप मुझे दण्डित करके क्या पाएँगे? यदि आपका अनुमान ठीक है और मैं पागल हूँ तो आपका यह दंड एक मरे हुए घोड़े को पीटने जैसा होगा। उससे कोई लाभ नहीं होगा। जब पागल को दंडित किया जाता है, तो उसका पागलपन ठीक नहीं होता है।
 
तात्पर्य
 इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति भौतिक अवस्था में अर्जित झूठे विशेष प्रभावों के अन्तर्गत पागल के समान आचरण करता है। उदाहरणार्थ, चोर यह जानता है कि चोरी अच्छा काम नहीं है और यह कि इसके बाद राजा या ईश्वर से दण्ड मिलता है तथा चोर पकड़े जाते हैं
और पुलिस उन्हें दण्ड देती है, तो भी वह बारम्बार चोरी करता है। उसके मन में यह विचार घर किये रहता है कि चोरी करने से वह सुखी हो जाएगा। यह तो पागलपन का लक्षण है। बारम्बार दण्डित होकर भी चोर अपनी चोरी करने की आदत नहीं छोड़ पाता, अत: दण्ड वृथा है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥