श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 10: जड़ भरत तथा महाराज रहूगण की वार्ता  »  श्लोक 2

 
श्लोक
यदा हि द्विजवरस्येषुमात्रावलोकानुगतेर्न समाहिता पुरुषगतिस्तदा विषमगतां स्वशिबिकां रहूगण उपधार्य पुरुषानधिवहत आह हे वोढार: साध्वतिक्रमत किमिति विषममुह्यते यानमिति ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
यदा—जब; हि—निश्चय ही; द्विज-वरस्य—जड़ भरत का; इषु-मात्र—एक बाण आगे तक (३ फुट); अवलोक-अनुगते:— देखकर ही चलने से; न समाहिता—मेल न खाता हुआ; पुरुष-गति:—कहारों की चाल; तदा—उस समय; विषम-गताम्— असन्तुलित होने पर; स्व-शिबिकाम्—अपनी पालकी को; रहूगण:—राजा रहूगण ने; उपधार्य—समझ कर; पुरुषान्—पुरुषों से; अधिवहत:—पालकी ले जाने वाले; आह—कहा; हे—अरे; वोढार:—कहारो; साधु अतिक्रमत—एक बराबर चलो जिससे उछाल न हो; किम् इति—किस कारण; विषमम्—असंतुलित, ऊँची-नीची; उह्यते—ले जाई जा रही है; यानम्—पालकी; इति—इस प्रकार ।.
 
अनुवाद
 
 किन्तु अपने अहिंसक भाव के कारण जड़ भरत पालकी को ठीक से नहीं ले जा रहे थे। जैसे ही वे आगे बढ़ते, हर तीन फुट पहले वे यह देखने के लिए रुक जाते कि कहीं कोई चींटी पर पांव तो नहीं पड़ रहा है। फलत: वे अन्य कहारों से ताल-मेल नहीं बैठा पा रहे थे। इसके कारण पालकी हिल रही थी। अत: राजा रहूगण ने तुरन्त कहारों से पूछा, “तुम लोग इस पालकी को ऊँची-नीची करके क्यों लिए जा रहे हो? अच्छा हो, यदि उसे ठीक से ले चलो।”
 
तात्पर्य
 यद्यपि जड़ भरत को पालकी ढोने के लिए बाध्य किया गया था, किन्तु उनके मन में मार्ग पर चलने वाली चींटियों के प्रति दयाभाव बना हुआ था। ईश्वर का भक्त अत्यन्त कष्टदायक परिस्थितियों में रहने पर भी भक्ति तथा अन्य उपयुक्त कार्यों को नहीं भूलता। यद्यपि जड़ भरत आध्यात्मिक ज्ञान में बढ़े चढ़े योग्य ब्राह्मण थे, किन्तु उनसे पालकी ढोने का कार्य लिया जा रहा था। उन्हें इसकी परवाह नहीं थी। फिर भी मार्ग पर चलते हुए उन्हें अपना यह कर्तव्य नहीं भूला था कि एक भी चींटी नहीं मरनी चाहिए। वैष्णव न तो ईर्ष्या करता है, न ही वृथा उग्र बनता है। मार्ग में अनेक चींटियाँ थीं, किन्तु जड़ भरत तीन फुट पहले ही इनके प्रति सचेत हो जाते। जब चींटियाँ निकल जातीं तभी वे आगे कदम रखते। वैष्णव समस्त जीवों के प्रति अत्यन्त
दयालु होता है। भगवान् कपिलदेव सांख्य योग में बताते हैं—सुहृद: सर्वदेहिनाम्। जीव विभिन्न रूप धारण करते हैं। जो अ-वैष्णव हैं, वे मात्र मनुष्य समाज को अपनी दया के योग्य समझते हैं, किन्तु श्रीकृष्ण अपने को समस्त प्राणियों का पिता कहते हैं। फलत: वैष्णव किसी भी प्राणी को असमय या वृथा ही विनष्ट नहीं होने देता। समस्त जीवों को विशेष भौतिक देह रूप में बँधकर कुछ अवधि पूरी करनी होती है। उन्हें स्वयं ही अन्य देह धारण करने के पूर्व इस शरीर के लिए निर्दिष्ट अवधि को पूरा करना होता है। इस प्रकार किसी पशु या अन्य जीव का वध उसे उस देह-अवधि को पूरा करने में बाधक बनता है। अत: किसी को भी अपनी इन्द्रिय-तृप्ति के हेतु प्राणियों का वध नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे वह पापकर्म में फँस जाएगा।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥