श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 10: जड़ भरत तथा महाराज रहूगण की वार्ता  »  श्लोक 5

 
श्लोक
सांसर्गिको दोष एव नूनमेकस्यापि सर्वेषां सांसर्गिकाणां भवितुमर्हतीति निश्चित्य निशम्य कृपणवचो राजा रहूगण उपासितवृद्धोऽपि निसर्गेण बलात्कृत ईषदुत्थितमन्युरविस्पष्टब्रह्मतेजसं जातवेदसमिव रजसाऽऽवृतमतिराह ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
सांसर्गिक:—संसर्ग से उत्पन्न; दोष:—अवगुण, त्रुटि; एव—निस्संदेह; नूनम्—निश्चय ही; एकस्य—एक व्यक्ति का; अपि— यद्यपि; सर्वेषाम्—अन्य सभी; सांसर्गिकाणाम्—उसके संसर्ग में आने वाले व्यक्तियों का; भवितुम्—होना; अर्हति—सम्भव है; इति—इस प्रकार; निश्चित्य—निश्चय करके; निशम्य—सुनकर; कृपण-वच:—दण्ड-भय से भयभीत दीन सेवकों के वचन; राजा—राजा; रहूगण:—रहूगण ने; उपासित-वृद्ध:—अनेक महापुरुषों का उपेदश सुना तथा उनकी सेवा किया हुआ; अपि— तो भी; निसर्गेण—अपने स्वभाव से, जो क्षत्रिय का था; बलात्—बलपूर्वक; कृत:—किया हुआ; ईषत्—कुछ-कुछ; उत्थित—जागृत; मन्यु:—क्रोध; अविस्पष्ट—ठीक से दृष्टिगोचर न होने वाला, अस्पष्ट; ब्रह्म-तेजसम्—उस (जड़ भरत) का ब्रह्म तेज; जात-वेदसम्—वैदिक अनुष्ठानों में भस्म से ढकी हुई अग्नि; इव—के समान; रजसा आवृत—रजोगुण से ढकी हुई; मति:—जिसकी बुद्धि; आह—कहा ।.
 
अनुवाद
 
 राजा रहूगण दण्ड से भयभीत कहारों के वचन का अभिप्राय समझ रहा था। उसकी समझ में यह भी आ गया कि मात्र एक व्यक्ति के दोष के कारण पालकी ठीक से नहीं चल रही। यह सब अच्छी प्रकार जानते हुए तथा उनकी विनती सुनकर वह कुछ-कुछ क्रुद्ध हुआ, यद्यपि वह राजनीति में निपुण एवं अत्यन्त अनुभवी था। उसका यह क्रोध राजा के जन्मजात स्वभाव से उत्पन्न हुआ था। वस्तुत: राजा रहूगण का मन रजोगुण से आवृत था, अत: वह जड़ भरत से, जिनका ब्रह्मतेज राख से ढकी अग्नि के समान सुस्पष्ट नहीं था, इस प्रकार बोला।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में रजोगुण तथा सत्त्वगुण का अन्तर बताया गया है। यद्यपि राजा राजनीति और राज्य संचालन में निपुण था, तो भी रजोगुणी होने के कारण थोड़ा विचलित होने पर क्रुद्ध हो गया। अपने गूँगे
तथा बहरे बनावे के कारण हो रहा अन्याय जड़ भरत को सहना पड़ा था, तो भी वे अपने आत्मज्ञान के कारण शान्त बने रहे। इतने पर भी उनका ब्रह्मतेज उनके शरीर से अस्पष्ट रूप से झलक रहा था।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥