श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 10: जड़ भरत तथा महाराज रहूगण की वार्ता  »  श्लोक 6

 
श्लोक
अहो कष्टं भ्रातर्व्यक्तमुरुपरिश्रान्तो दीर्घमध्वानमेक एव ऊहिवान् सुचिरं नातिपीवा न संहननाङ्गो जरसा चोपद्रुतो भवान् सखे नो एवापर एते सङ्घट्टिन इति बहुविप्रलब्धोऽप्यविद्यया रचितद्रव्यगुणकर्माशयस्वचरमकलेवरेऽवस्तुनि संस्थानविशेषेऽहं ममेत्यनध्यारोपितमिथ्याप्रत्ययो ब्रह्मभूतस्तूष्णीं शिबिकां पूर्ववदुवाह ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
अहो—ओह; कष्टम्—कितना कष्टप्रद है यह; भ्रात:—मेरे भाई; व्यक्तम्—स्पष्ट; उरु—अत्यन्त; परिश्रान्त:—थके हुए; दीर्घम्—लम्बा; अध्वानम्—मार्ग; एक:—अकेले; एव—ही; ऊहिवान्—ढोते हुए; सु-चिरम्—दीर्घ काल तक; न—नहीं; अति-पीवा—अत्यन्त हट्टा कट्टा; न—नहीं; संहनन-अङ्ग:—सुगठित शरीर; जरसा—बुढ़ापे से; च—भी; उपद्रुत:—विचलित, दबाया हुया; भवान्—आप; सखे—मेरे मित्र; नो एव—निश्चय ही नहीं; अपरे—दूसरे; एते—ये सब; सङ्घट्टिन:—सह-कर्मी; इति—इस प्रकार; बहु—अत्यधिक; विप्रलब्ध:—ताना मारे जाने पर; अपि—यद्यपि; अविद्यया—अज्ञान से; रचित—रचा हुआ; द्रव्य-गुण-कर्म-आशय—भौतिक तत्त्वों, गुणों तथा कर्मफल एवं आकांक्षाओं के मिश्रण में; स्व-चरम-कलेवरे—शरीर में, जो सूक्ष्म तत्त्वों (मन, बुद्धि तथा अहं) से चालित है; अवस्तुनि—ऐसी भौतिक वस्तुओं में; संस्थान-विशेषे—विशेष मनोवृत्ति वाला; अहम् मम—मैं तथा मेरा; इति—इस प्रकार; अनध्यारोपित—ऊपर से थोपा नहीं; मिथ्या—झूठा; प्रत्यय:—विश्वास; ब्रह्म-भूत:—स्वरूप-सिद्ध, ब्रह्म पद को प्राप्त; तूष्णीम्—चुप रहकर; शिबिकाम्—पालकी; पूर्व-वत्—पहले की तरह; उवाह—ले गया ।.
 
अनुवाद
 
 राजा रहूगण ने जड़ भरत से कहा : मेरे भाई, यह कितना कष्टप्रद है! तुम निश्चित ही अत्यन्त थके लग रहे हो, क्योंकि तुम बहुत समय से और लम्बी दूरी से किसी की सहायता के बिना अकेले ही पालकी ला रहे हो। इसके अतिरिक्त, बुढ़ापे के कारण तुम अत्यधिक परेशान हो। हे मित्र, मैं देख रहा हूँ कि तुम न तो मोटे-ताजे हो, न ही हट्टे-कट्टे हो। क्या तुम्हारे साथ के कहार तुम्हें सहयोग नहीं दे रहे? इस प्रकार राजा ने जड़ भरत को ताना मारा, किन्तु इतने पर भी जड़ भरत को शरीर की सुधि नहीं थी। उसे ज्ञान था कि वह शरीर नहीं है, क्योंकि वह स्वरूपसिद्ध हो चुका था। वह न तो मोटा था, न पतला, न ही उसे पंच स्थूल भूतों तथा तीन सूक्ष्म तत्त्वों के इस स्थूल पदार्थ से कुछ लेना-देना था। उसे भौतिक शरीर तथा इसके दो हाथों तथा दो पैरों से कोई सरोकार न था। दूसरे शब्दों में, कहना चाहें तो कह सकते हैं कि वह ‘अहं ब्रह्मास्मि’ अर्थात् ब्रह्म रूप को प्राप्त हो चुका था। अत: राजा की व्यंग्य पूर्ण आलोचना का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह बिना कुछ कहे पूर्ववत् पालकी को उठाये चलता रहा।
 
तात्पर्य
 जड़ भरत पूर्णतया मुक्त थे। जब डाकुओं ने उनके शरीर की बलि देनी चाही थी तब भी उन्हें कोई परवाह नहीं थी, क्योंकि उन्हें ज्ञात था कि वे शरीर नहीं हैं। यदि उनका शरीर नष्ट भी कर दिया जाता तो भी वे परवाह नहीं करते, क्योंकि उन्हें भगवद्गीता की इस उक्ति (२.२०)—न हन्यते हन्यमाने शरीरे —पर पूर्ण विश्वास था। उन्हें पता था कि शरीर के मारे जाने पर भी उन्हें नहीं मारा जा सकता। यद्यपि उन्होंने कोई प्रतिवाद नहीं किया, किन्तु पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अपने भक्त के प्रति डाकुओं के इस अन्याय को नहीं सहन कर सके, अत: डाकू मारे गये और श्रीकृष्ण के अनुग्रह से वे बच गये। इस घटना में पालकी
ढोते समय भी उन्हें पता था कि वे शरीर नहीं हैं। उनका शरीर पालकी ले जाने में पूर्ण सक्षम था, क्योंकि वह हृष्ट-पुष्ट तथा सुगठित था। देहात्म-बोध से मुक्त होने के कारण राजा के व्यंग्य एक विशेष प्रकार के वचनों का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा था। शरीर की उत्पत्ति कर्म के अनुसार होती है और प्रकृति एक विशेष प्रकार के शरीर के विकास के लिए सारी सामग्री जुटाती है। शरीर के भीतर का आत्मा शरीर की रचना से पृथक् है, अत: शरीर के प्रति किया गया कोई उपकार या अपकार आत्मा को प्रभावित नहीं करता। वैदिक आदेश है—असंगो ह्ययं पुरुष:—आत्मा कभी भी भौतिक विधानों से प्रभावित नहीं होता।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥